फुटबाल के सुपरस्टार माने जाने वाले लियोनेल मेसी की प्रतिमा अभी हाल ही में कोलकाता मे लगाईं गई है |इस 70 फुट ऊंची प्रतिमा का उदघाटन मेसी द्वारा किया गया | सोशल मीडिया में आई एक खबर के बाद इस प्रतिमा को लेकर विवाद खड़ा हो गया है |
यह विवाद प्रतिमा निर्माण में सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग और विकास की प्राथमिकताओं को लेकर छिड़ गया है | इस सम्बन्ध में सोशल मीडिया पर समर्थन और विरोध में तीखी प्रतिक्रियों की बाढ़ सी आ गयी है | फीफा, फुटबाल और मानवअधिकार के मध्य गहरा सम्बन्ध है |
इसका विरोध करने वालों का मानना है कि कलकत्ता में मेसी की प्रतिमा स्थापना में सार्वजानिक संसाधनों का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए | विरोध करने वालों ने नीतिगत जबाबदेही की मांग उठा दी है |
विकास का अधिकार बनाम सार्वजानिक संसाधन
विकास का अधिकार मानव की मूलभूत आवश्यकतों से जुड़ा हुया है, जैसे कि स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छ वातावरण, आवास तथा भोजन आदि |
यदि शहर के स्कूलों में बुनियादी शैक्षणिक सुविधाओं की कमी है, स्वास्थ्य व्यवस्थाओं का अभाव है, शहरी गरीबों पर आवास की कमी है या स्वच्छ पानी और वातावरण का अभाव है, तो आमजान सार्वजनिक संसाधनों को मूर्तियों पर खर्च लिए जाने पर सवाल उठाये बिना नहीं मानेगे |
सार्वजानिक संसाधनों के उपयोग की प्राथमिकता के आधार पर प्रश्न उठना लाजमी है |मानव अधिकार सिद्धांत भी कहते है कि सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग में इक्विटी का अनुसरण किया जाना चाहिए अर्थात समाज के उस तबके पर खर्च के सम्बन्ध में प्राथमिकता दी जानी चाहिए जिसे इसकी ज्यादा जरूरत है |
डिजिटल बहस अभिव्यक्ति की स्वंत्रता
लोकतंत्र में सवाल करना या असहमति व्यक्त करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है | समय बदल गया है और अपनी बात रखने के लिए सरकारों का शारीरिक रूप से उपस्थित रहकर घेराव करना पुरानी बाते हो चुकी है |
वर्तमान समय में डिजिटल तकनीकी बहुत आगे बढ़ चुकी है ऐसी स्थति में लोग अपना विरोध डिजिटल रूम में सोशल मीडिया या अन्य आधुनिक साधनो से कर सकते है |
उन्हें शारीरिक रूप से एक स्थान पर विरोध करने के लिए उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं है | आलोचना किसी भी मजबूत लोकतंत्र की आत्मा है उसकी ताकत है कोई कमजोरी नहीं है |
संतुलित रास्ता: खेल भी, अधिकार भी
कोलकाता की पहचान खेल से भी जानी जाती है | वहां खेलों के प्रति आस्था धार्मिक आस्था के समानं है | खेल टकराव का विषय नहीं है बस बात इतनी सी है कि सार्वजानिक संसाधन आम लोगों के विकास के लिए होते हैं |
यदि उनका उपयोग नागरिक सुविधाओं से परे किसी अन्य कार्य के लिए किया जाता है तो यह निश्चित रूप से आमजन को टकराव के लिए उकसाएगा | आवश्यकता संतुलन स्थापित करने की है खेल भी बना रहे और आमजन का विकास का अधिकार का भी उलंघन न हो |
खेल संस्कृति को प्रोत्साहित करने के लिए कॉर्पोरेट सोशल फण्ड का उपयोग किया जा सकता है तथा सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग लोगो के बुनियादी अधिकारों के संवर्धन और संरक्षण के लिए किया जा सकता है |
सार्वजनिक धन के उपयोग से पूर्व इस बात का आकलन किया जाना चाहिए कि उसके उपयोग से क्या सामाजिक प्रभाव पढ़ने वाला है |
निष्कर्ष
कोलकात्ता में विश्व प्रसिद्ध फ़ुटबाल खिलाड़ी खिलाड़ी की प्रतिमा के खिलाफ बहुत ही कम लोग होंगे लेकिन अधिकाँश लोगो की आवाजें प्रतिमा स्थापना में उपयोग किये गए सार्वजानिक संसाधनों के विरुद्ध हैं |
खेल से जुडी आस्था का निश्चित रूप से सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन जनता की गाड़ी कमाई के रूप में सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग उनके मानव अधिकारों को संवर्धित करने के लिए किया जाना उचित है न कि उनके मानव अधिकारों में कटौती के लिए |
एक मजबूत और सशक्त लोकतंत्र के लिए खेल की उन्नति भी आवश्यक है और आम लोगो के मानव अधिकारों की सुरक्षा भी आवश्यक है |
इस क़ानून का उद्देश्य स्पष्ट था -हाथ से मैला ढोने पर पूर्ण प्रतिषेध तथा प्रभावित परिवारों की पहचान कर उनके लिए पुनर्वास जिसमे वैकल्पिक रोजगार के लिए ऋण सुविधा, कौशल प्रशिक्षण, बच्चों की शिक्षा के लिए सुविधाएं देकर उनके जीवन को मानवीय गरिमा प्रदान करना |
हाथ से मैला ढोने की अमानवीय व्यवस्था में इंसानो को जाम हो गए नाले और मेनहॉल को साफ़ करने तथा खोलने के काम में लगाया जाता है | इस कार्य में उन्हें मलमूत्र और अन्य गंदगी से भरे मलवे और पानी में पूरी तरह डूबने पर मजबूर होना पड़ता है |
लेकिन दुर्भाग्य से 21वीं सदी का एक चौथाई समय गुजरने के बाद भी आज के सभ्य समाज में यह अमानवीय प्रथा अभी भी अस्तित्व में है – क्या कानून धरातल पर उतरा है ?
कानून उपलब्ध होने के बाबजूद इस समस्या को समाप्त करने में सफल क्यों नहीं हुए ? यह एक चिंतनीय विषय है | इस समस्या पर कानून बनने के बाद एक सांसद को लोकसभा में सरकार के समक्ष प्रश्न क्यों उठाना पड़ रहा है ? सभी के लिए सोचनीय विषय है |
हाल ही में शिवसेना के सांसद राजभाऊ वाजे ने लोकसभा में मैला ढोने का प्रतिषेध एवं पुनर्वास अधिनियम के सम्बन्ध में सरकार द्वारा किये जा रहे अमल के बारे में सरकार को कटघरे में खड़ा किया तथा उन्होंने कहा कि क़ानून आज भी कागजों तक सीमित है |
उनका कहना था कि क़ानून के तहत पुनर्वास का लाभ लाभार्थिओं तक नहीं पहुंच रहा है | प्रश्न उठता है कि कानून की क्रियान्वन की जिमेदारी कौन लेगा ?
कानून के क्रियान्वयन की यह अत्यधिक निराशाजनक स्थति केवल सरकारी अमले की विफलता को नहीं दर्शाता है, बल्कि यह मानवाधिकारों का गंभीर उलंघन है |
भारतीय संविधान का अनुछेद 21 हर व्यक्ति को गरिमामयी जीवन व्यतीत करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है | बाबजूद इसके आज भी समाज का एक वंचित वर्ग आधुनिक तकनीकी के दौर में भी नालियों, सीवर और गटरों में उतरने को विवश किया जाता है | ऐसी स्थति में संविधान द्वारा प्रदत्त यह मौलिक अधिकार व्यर्थ हो जाता है |
यही नहीं क़ानून को बने 10 वर्ष से अधिक हो गए, लेकिन उसके उचित क्रियान्वयन के बिना वह भी अर्थहीन हो जाता है |
Human Rights Guru ब्लॉग पर पहले प्रकाशित लेख में भी स्पष्ट किया गया है कि क़ानून के क्रियान्वयन के लिए उत्तरदायी संस्थाओं की निष्क्रियता के कारण हाथ से मैला ढोना मानव अधिकार उलंघन बन चुका है | मैला ढोने के दौरान मृत्यु के कई मामलों में पुनर्वास के रूप में मुआवजे के लिए भी अदालत का दरवाजा खटखना पड़ा है |
सांसद राजभाऊ वाजे ने यह भी कहा है कि सरकार ने स्वछता और सीवर सफाई के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी आधारित मशीनीकरण में दिलचपी न दिखाने पर अवसोश जाहिर किया |
यदि मैला ढोने की अमानवीय और शोषणकारी प्रथा को मानव अधिकार दृश्टिकोण से देखा जाए तो आज के उन्नत तकनीकी के दौर में सफाई व्यस्था का मशीनीकरण किया जाना न सिर्फ एक आधुनिक वैज्ञानिक सुधार है, बल्कि समाज के हासिये पर स्थित लोगो के मानव अधिकारों की रक्षा का एक अनिवार्य उपाय भी है |
आज विश्व भर में यह कार्य आधुनिक मशीनों द्वारा किया जा रहा है, लेकिन भारत में सीवर और गटर सफाई कर्मियों की जान जोखिम में डाली जाती है, तो यह राज्य की नैतिक और कानूनी विफलता की ओर स्पष्ट इशारा है |
इससे राजनैतिक इच्छा की भी स्पष्ट कमी झलकती है, जो कि मैला ढोने समस्या के समूल उन्मूलन के लिए आवश्यक है |
हाथ से मैला ढोने की अमानवीय समस्या सिर्फ अतीत की विडम्बना नहीं है, बल्कि यह वर्तमान में भी अपना रूप बदल कर बरकरार है | इस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए वेजवाडा विल्सन ने बहुत संघर्ष किया है |
आधुनिक समाज में आज यह एक मानव अधिकार संकट के रूप में व्याप्त है | जब तक यह कानूनों के पन्नों से असल जिंदगी में नहीं आच्छादित की जाती है तब तक इसके समाधान की उम्मीद करना बेमानी है |
इस बेरहम प्रथा का खात्मा सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि सभ्य समाज को भी इसमें अपनी गंभीर भूमिका निभानी होगी |
हम सभी को समाज में अपनी नैतिक और मानव अधिकार जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी क्यों कि मानव अधिकार चुप रहने से नहीं बचते हैं |
10 दिसम्बर 2025 को आज सम्पूर्ण विश्व में मानव अधिकार दिवस बहुत धूमधाम से मनाया गया है| मानव अधिकार दिवस सिर्फ एक दिन का उत्सव नहीं है, बल्कि हर दिन और हर समय व्यक्ति के जीवन में रोजमर्रा के जरूरतों से जुड़ा हुया महोत्सव है |
मानव अधिकार दिवस विश्व भर के लोगों और सरकारों को यह अवसर देता है कि मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के बाद से लेकर अब तक क्या हम मानवाधिकार सिद्धांतों के अनुरूप दुनिया बना पाएं हैं कि नहीं ? भारत जैसे विविधताओं से भरे लोकतांत्रिक देश के लिए यह प्रश्न और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है |
भारत ने देश में मानव अधिकारों के संवर्धन और संरक्षण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन किया है | राज्यों में राज्य मानव अधिकार आयोगों का गठन किया है तथा में मानव अधिकार के मुकदद्मों की सुनवाई के लिए हर जिले में मानव अधिकार अदालतों की स्थापना की गई है |
सैद्धांतिक रूप से मानव अधिकार एक जटिल विषय है, लेकिन मानव अधिकारों को जन -जन तक पहुंचाने के लिए 10 दिसम्बर 2025 की थीम को आदमी की जरूरतों से जोड़ा गया है |
इस बार विश्व मानव अधिकार की थीम “मानव अधिकार : हमारी रोजमर्रा की जरूरतें” रखा गया है| आज के उथलपुथल वाले दौर में सुख, शांति, समानता और स्वंत्रता के साथ जीवन बिताना आसान काम नहीं है | इसी को आसान बनाने के लिए इस वर्ष की थीम में रोजमर्रा की जरूरतों से जोड़ा गया है |
आखिर रोजमर्रा की जरूरतों से मानव अधिकार जैसे गंभीर विषय का क्या लेना देना है, बस यहीं समझने की जरूरत है कि रोजमर्रा की जरूरते मानव अधिकारों को कैसे प्रभावित करती है |
मानव अधिकार तथा रोजमर्रा की जरूरतें दरअसल अलग -अलग न हो कर एक दुसरे के पूरक हैं |उदाहरण के तौर पर रोटी, कपड़ा, आवास, स्वच्छ वातावरण, स्वच्छ पीने योग्य पानी, बिना किसी भेदभाव के स्वतन्त्रता, स्वैक्षिक लिंग निर्धारण का हक, बोलने और अपनी पसंद का खाना खाने की स्वंत्रता,आदि अनेक ऐसी रोजमर्रा की आवश्यकताएं हैं, जिनके बिना व्यक्ति का चहुमुखी विकास होना संभव नहीं है |
दरअसल इस वर्ष की थीम के माध्यम से मानव अधिकारों की कठिन व्याख्या को अत्यधिक सरल भाषा में अत्यधिक आम जरूरतों से जोड़ने का प्रयास किया गया है |
यह प्रयास निश्चित रूप से मानव अधिकारों में आम आदमी की दिलचस्पी पैदा करने के साथ -साथ मानव अधिकारों को शिक्षा का जटिल विषय से बाहर लाकर आम आदमी तक उनके मानव अधिकारों की जानकारी पहुंचाने का एक अभिनव प्रयास है |
आपने देखा होगा कि दिल्ली में पटाखों तथा आसपास के राज्यों में खेतों में पराली जलाने के कारण विगत कई वर्षों से वायु प्रदुषण का स्तर बढ़ जाता है, जिसके चलते यह मामला भारत के सर्वोच्च न्यायालय में तथा राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल में पहुंचा |
जिसके बाद आम आदमी की रोजमर्रा के जरूरत अर्थात शुद्ध हवा के लिए न्यायालय ने सरकार को दिशा निर्देश दिए |
आम आदमी के लिए शुद्ध हवा और वातावरण की कमी और प्रदुषण के बढ़ते स्तर के कारण सांस सम्बन्धी रोगियों की संख्या में इजाफा देखा गया |
प्रदूषित वातावरण के कारण आम आदमी के जीवन के अधिकार का उलंघन होता है | स्वच्छ वातावरण और शुद्ध हवा का अभाव व्यक्ति के स्वास्थ्य के मानव अधिकार का उलंघन करता है |
पानी जैसी रोजमर्रा की जरूरत के लिए भी लोगो को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा | अधिकाँश लोग अवगत होंगे कि शहर से निकलने वाला सीवेज का पानी बिना किसी सफाई प्रक्रिया के गंगा में छोड़ा जाता था |
न्यायालय ने इस सम्बन्ध में दिशानिर्देश दिए | जिसके परिणाम स्वरुप सरकार द्वारा गंगा की सफाई के लिए नमामि गंगे जैसे प्रोजेक्ट चलाये गए | पीने लायक पानी की उपलब्धता एक मानव अधिकार है | भारतीय न्यायलयों ने इसे जीवन के अधिकार के तहत समाहित किया गया है |
आज सम्पूर्ण दुनिया एक छोटे से गांव में तब्दील हो गई है | विश्व के एक कोने का व्यक्ति दूसरे कोने में काम या किसी अन्य सिलसिले में पहुंच रहा है | ऐसी स्थति में अंतराष्टीय मानव अधिकार दो प्रौढ़ व्यक्तियों को विवाह का अधिकार देता है |
ऐसी स्थति में उनका विवाह दो विभिन्न संस्कृतियों और रीतिरिवाजों के टकराव का मुद्दा बन सकता है, लेकिन मानव अधिकार बिना किसी बाधा के उन्हें विवाह का अधिकार देते हैं |
मानव अधिकार हमारी रोजमर्रा की आवश्यकताएं अभियान से सयुंक्त राष्ट्र संघ लोगो को मानव अधिकार से फिर से जोड़ना चाहता है |
सयुक्त राष्ट्र संघ का मानना है कि लोग ऐसे तरीकों पर अक्सर ध्यान नहीं देते है जो उनके मानव अधिकारों को प्रभावित करते हैं |
मानव अधिकारों को लोग अधिक महत्व नहीं देते हैं | जबकि वे अत्यधिक आवश्यक चीजें है जिन पर वह निर्भर रहते हैं | मानवाधिकार सिद्धांतों और रोजमर्रा के अनुभवों के बीच की खाई है |
यह अभियान उसे पाटने का प्रयास है | इस अभियान का लक्ष्य आम आदमी के बीच जागरूकता पैदा करना, आत्मविश्वास जगाना है।
भारतीय सन्दर्भ में आम आदमी की रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े हुए अनेक विषय हैं | जिनके सम्बन्ध में जागरूक लोगों ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और उन्हें अपने मानव अधिकार प्राप्त करने में सफलता मिली |
इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ की यह पहल उनकी रोजमर्रा की जरूरतों सम्बन्धी मानव अधिकारों के बारे में जागरूकता फैलाने में सफल होगी |
जिसके परिणाम स्वरुप आम आदमी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों सम्बन्धी मानव अधिकारों के लिए आवाज उठा सकेगा, जबकि अभी जानकारी के अभाव में वे रोजमर्रा की जरूरतों सम्बंधित मानव अधिकारों पर बिलकुल ध्यान ही नहीं देते हैं |
यह लेख केवल शैक्षणिक और विधिक जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |
डिजिटल युग में POCSO Victim की सुरक्षा, गोपनीयता और पुनर्वास के लिए नए मानव अधिकार मॉडल की आवश्यकता
परिचय
भारत में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की यौन अपराधों से सुरक्षा के उद्देश्य से POCSO एक्ट (POCSO Act, 2012) बनाया गया था|
POCSO एक्ट से जुडी असली चुनौती सिर्फ अपराधियों के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराना या अपराधियों को सजा दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि सबसे बड़ी चुनौती POCSO Victim बच्चों की सुरक्षा , गोपनीयता तथा सामाजिक, मानसिक, आर्थिक पुनर्वास को सुनिश्चित किया जाना है |
इन्ही महत्वपूर्ण मुद्दों को दृष्टिगत रखते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल ही में POCSO Victim के सम्बन्ध में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया है |
यह निर्णय POCSO Victim के सम्बन्ध में सुरक्षा, गोपनीयता और पुनर्वास का दायित्व राज्य के ऊपर डालता है |
अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार को निर्देशित किया कि वह तत्काल प्रभाव से एक डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार करे | जिसका एक SOP (Standard Operative Procedure) हो |
जिसके माध्यम से POCSO Victim की सुरक्षा और पुनर्वास का प्रबंधन आसान, पारदर्शी और बेहतर हो सके |
POCSO Victim बच्चों के हित और उनके मानव अधिकार संरक्षण की दिशा में भारत के किसी हाई कोर्ट द्वारा दिया यह पहला अनोखा फैसला है |
इस फैसले में POCSO Victim बच्चो की गोपनीयता बनाये रखने के लिए डिजिटल तकनीकी के उपयोग के लिए राज्य को निर्देशित किया गया है |
POCSO डिजिटल मानवाधिकार मॉडल में मुख्य रूप से POCSO Victim का PID संरक्षित पहचान डाटाबेस, डिजिटल POCSO पोर्टल (DPP) तथा समयबद्ध SOP शामिल हैं |
इस मॉडल के लिए POCSO Victim के मानव अधिकारों को संरक्षित करने के लिए डिजिटल तकनीकी के उपयोग को प्रोत्साहित किया गया है |
इसके आ जाने से न सिर्फ POCSO Victim को त्वरित न्याय की उम्मीद जगी है, बल्कि भविष्य में यह मॉडल POCSO Victim बच्चो के न्याय और उनके मानवाधिकार संरक्षण का एक अनोखा उदाहरण साबित होगा|
POCSO Victim के मामलों में नौकरशाही की लेटलतीफी और लापरवाही को रोकने तथा POCSO Victim के संरक्षण और पुनर्वास के लिए कर्नाटका हाईकोर्ट ने एक डिजिटल तकनीकी आधारित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP: Standrad Operative Procedure) का अनुपालन करने के लिए सरकार को दिशा निर्देश दिए हैं|
इसमें POCSO Victim की गोपनीयता बनाये रखने के लिए भी डिजिटिल तकनीकी के उपयोग के निर्देश दिए गए हैं |
कर्नाटक हाई कोर्ट द्वारा POCSO Victim के सन्दर्भ में बेहतर और पारदर्शी निगरानी और उनकी गोपनीयता, संरक्षण और पुनर्वास सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल तकनीकी आधारित SOP जारी करने के लिए दिशा निर्देश जारी किये गए हैं |
इस एसओपी का उद्देश्य नाबालिगों के विरुद्ध होने वाले यौन अपराधों के रोकने तथा अपराध होने के बाद POCSO Victim के संरक्षण और पुनर्वास को सुनिश्चित करने के लिए एकल, एकीकृत, समयबद्ध और प्रौद्योगिकी-संचालित कार्यप्रणाली स्थापित करना है |
इसका उद्देश्य अपराध होने के बाद एक स्पष्ट मार्ग प्रदान करना है जिसके तहत अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट से लेकर POCSO Victim के सफल पुनर्वास तक अनावश्यक प्रक्रियात्मक देरी को टालना या कम करना, उसकी अस्पष्टता को समाप्त करना तथा विभिन्न हितधारकों के बीच के टकराव को समाप्त करना है |
1. प्रत्येक POCSO Victim के लिए तत्काल सुरक्षा, चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक प्राथमिक सहायता की गारंटी उपलब्ध कराना।
2. POCSO मुकदद्मे के प्रत्येक स्तर पर POCSO Victim बच्चों के अनुकूल प्रक्रियाओं को लागू करके शीघ्र, संवेदनशील और उन्हें आघात न लगे ऐसी जांच सुनिश्चित करना।
3. POCSO मुकदद्मे के दौरान सभी कार्यवाहियों और अभिलेखों में POCSO Victim की पहचान की पूर्ण रूप से डिजिटल तकनीकी द्वारा गोपनीय बनाये रखना |
4. हर हितधारक की स्पष्ट रूप से परिभाषित भूमिकाओं के माध्यम से बिना किसी बाधा के अंतर-एजेंसी प्रतिक्रिया का समन्वय करना।
POCSO मामलो को कई अलग अलग संस्थाए देखती है जैसे कि पुलिस, बाल कल्याण समिति, चिकित्सा विभाग, मनोवैज्ञानिक, फॉरेंसिक विज्ञान विभाग आदि |
इस SOP का औचित्य इस मान्यता से उत्पन्न हुया है कि POCSO के मामलों की देखरेख करने वाली संस्थाए अक्सर खंडित और देर से प्रतिक्रियाएँ देती हैं जिसके कारण POCSO Victim बच्चों को अनावश्यक आघात झेलना पड़ता है |
एक एकीकृत डिजिटल तकनीकी प्लेटफॉर्म POCSO अधिनियम की प्रक्रियात्मक और जबाबदेही का एक स्पष्ट ढांचा बनाता है |
यह ढांचा हितधारियों को उनके कर्तव्य के लिए प्रेरित करता है| अदालत ने कहा है कि बाल अधिकारों पर सयुंक्त राष्ट्र सम्मेलमन के तहत भारत अंतराष्ट्रीय प्रतिबद्धता को अमली जामा पहनाया जा सके |
SOP एक डिजिटल तकनीकी आधारित एकीकृत प्रणाली है | जो POCSO में प्रथम सूचना रिपोर्ट से लेकर पुनर्वास तक गहन निगरानी रखती है | यह प्रणाली समयबद्ध सटीक और आवश्यक सूचनाएं उपलब्ध कराने में सक्षम है |
इसके माध्यम से POCSO Victim के संरक्षण और पुनर्वास में नौकरशाही की लेट-लतीफी को रोका जा सकता है तथा सही समय से POCSO Victim तक कानूनी सहायता, कॉउन्सिलिंग से लेकर पुनर्वास की सुविधाएं बिना किसी देरी के और सुचारु रूप से पहुंचाई जा सकती हैं |
छद्म नाम पहचानकर्ता (PID) और पहचान वॉल्ट प्रोटोकॉल
कर्नाटका हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार तकनीकी रूप से POCSO अधिनियम की धारा 23 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 228 का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित के लिए, DPP के तहत एक सख्त गुमनामीकरण प्रोटोकॉल लागू किया जाएगा।
CCTNS/DPP पर FIR दर्ज होने पर, सिस्टम स्वचालित रूप से POCSO Victim के लिए एक विशिष्ट छद्म नाम पहचानकर्ता (PID) तैयार करेगा।
इसके बाद POCSO की सभी कार्यवाहियों के अनुक्रम में जिसके तहत सभी दस्तावेज़, संचार, चिकित्सा रिपोर्ट, बयान और सभी एजेंसियों के अदालती आदेश आते हैं, केवल इसी PID का उपयोग करेंगे।
POCSO Victim की पहचान सम्बंधित सभी विवरण डीपीपी के भीतर एक अत्यधिक एन्क्रिप्टेड “पहचान वॉल्ट” में अलग से संग्रहीत किए जाएँगे। इस वॉल्ट तक पहुँच तकनीकी रूप से केवल अधिकृत कर्मियों तक ही सीमित होगी।
किसी भी अन्य पक्ष, जिसमें विशेष न्यायालय भी शामिल है, को केवल एक विशिष्ट, तर्कसंगत न्यायिक आदेश के आधार पर ही पहुँच प्रदान की जाएगी, और ऐसी पहुँच सीमित अवधि के लिए होगी और एक अपरिवर्तनीय ऑडिट ट्रेल में दर्ज की जाएगी।
इस प्रणाली से POCSO के तहत POCSO Victim की गोपनीयता सम्बन्धी प्रावधान गोपनीयता संरक्षण गारंटी में बदल जाएंगे |
यह एक केंद्रीय कमांड और नियंत्रण व्यवस्था है | अदालत ने निर्देशित किया कि सरकार तेजी तथा सुदृढ़ तकनीकी के साथ एक आवश्यक, सुरक्षित क्लाउड आधारित डिजिटल POCSO पोर्टल प्रारम्भ करेगी |
यह पोर्टल स्वंत्रत न होकर राष्ट्रीय ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट फैज III के पहले से उपलब्ध इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ेगा |
यह कर्नाटक राज्य के अंदर सभी POCSO कोर्ट्स के लिए सिंगल विंडो प्लेटफॉर्म के रूप में काम करेगा | DPP के मुख्य फीचर्स में सभी हितधारकों के लिए रोल-आधारित सिक्योर लॉगिन, टू फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA), एक सेंट्रलाइज्ड एन्क्रिप्टेड डॉक्यूमेंट रिपॉजिटरी, ऑटोमेटेड टास्क एलोकेशन और नोटिफिकेशन, और सभी हितधारकों के लिए एक वास्तविक- समय निगरानी डैशबोर्ड शामिल किया जाएगा।
इस आधुनिक डिजिटल तकनीकी आधारित प्रणाली के माध्यम से POCSO मामले की स्थति, POCSO Victim के संरक्षण की आवश्यकता तथा POCSO Victim के पुनर्वास की आवश्यकता और स्थति को वास्तविक समय पर जाना जा सकेगा |
इस प्रक्रिया में प्रथम सूचना रिपोर्ट के बाद बिना किसी देरी के आरोप पत्र का दाखिला तथा POCSO Victim को प्रदान किये गए मुआवजे और पुनर्वास की स्थति की निगरानी वास्तविक समय के अनुसार की जा सकेगी |
इस प्रणाली द्वारा बिना किसी देरी के POCSO मामले में POCSO Victim के समक्ष आ रही बाधाओं को पहचाना जा सकेगा |
पोक्सो सम्बंधित कार्यवाहियों की स्वचालित समय-सीमाएँ और अलर्ट का प्रावधान
डीपीपी एक सक्रिय डिजिटल अनुपालन इंजन है। इस प्रणाली को का SOP द्वारा अनिवार्य सभी वैधानिक और प्रक्रियात्मक समय-सीमाओं के साथ प्रोग्राम किया जाएग |
उदाहरण के लिए POCSO मामलों के सम्बन्ध में अलग -अलग कार्यों के लिए समय सीमा निर्धारित की गई है |
यदि इस समय सीमा का जिम्मेदार अदिकारियों या कर्मचारियों द्वारा एक निर्धारित समय सीमा में पालन नहीं किया जाता है तो तो जिला जज या निगरानी समिति के डेशबोर्ड पर अलग -अलग रंग में अलर्ट दिखाने लगता है |
चिकित्सा परीक्षा के लिए 24 घंटे की समय-सीमा, FSL रिपोर्टों के लिए 15 दिनों की समय-सीमा, और चार्जशीट दाखिल करने के लिए 60/90 दिनों की अवधि निर्धारित की गई है।
इस प्रणाली के तहत एक रीयल-टाइम, ट्रैफिक-लाइट रंग-कोडित प्रणाली निगरानी पर दिखाई देने लगती है |
जिला न्यायाधीश और निगरानी समिति के डैशबोर्ड पर यदि हरा रंग दिखाई दे रहा है तो निर्धारित समय-सीमा के भीतर कार्य पूरा होने का संकेत मिलता है |
यदि रंग पीला है तो समय-सीमा अपनी अंतिम तिथि के करीब है (जैसे, 48 घंटे शेष हैं) और यदि यह रंग लाल है तो समय-सीमा का उल्लंघन हुआ है।
किसी भी महत्वपूर्ण समय-सीमा का उल्लंघन होने पर, एक स्वचालित, सिस्टम-जनित उच्चीकरण अलर्ट एसएमएस और आधिकारिक ईमेल के माध्यम से नामित पर्यवेक्षी प्राधिकारी को भेजा जाता है | यह डिजिटल तकनीकी शून्य विलम्ब सुनिश्चित करने में मदद देती है |
पॉक्सो डिजिटल मानव अधिकार मॉडल के अनुपालन के लिए अदालत द्वारा दर्शित मार्गदर्शक सिद्धांत
कर्नाटका हाई कोर्ट द्वारा निर्देशित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) समझौता न किये जाने वाले सिद्धांतों के एक समूह पर आधारित है, जिसका अनुपालन सभी हितधारकों द्वारा POCSO की हर कार्यवाही, निर्णय और उसके प्रावधानों की व्याख्या में किया जाना चाहिए | ये सिद्धांत निम्नवत हैं :
1. बच्चों के सर्वोत्तम हित का सिद्धांत
POCSO के सम्बंधित सभी निर्णय बच्चो के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रख कर किये जायेगे | बच्चों के सर्वोत्तम हित के विपरीत किसी भी प्रक्रिया या आदेश की अनुमति नहीं है | POCSO Victim बच्चो का का शारीरिक, मानसिक और विकासात्मक हित सर्वोपरि रखना होगा |
2. आघात -सूचित देखभाल
POCSO Victim बचे से बात-चीत करने के दौरान सभी कर्मचारियों, जिसमे पुलिस ,डॉक्टर, परामर्शदाता और न्यायिक अधिकारी आते है, को बच्चे को लगे सदमे/आघात के संकेतों और लक्षणों को समझने और उसके बाद प्रतिक्रिया देने के लिए उनका उचित प्रशिक्षण किया जाना चाहिए |
न्याय व्यवस्था द्वारा सक्रीय रूप से POCSO Victim का पुनः उत्पीड़न रोकने के लिए भरस्कर प्रयास किये जाने चाहिए |
3. शून्य विलंब का सिद्धांत
POCSO के मामलों में अदालत ने शून्य विलम्ब के सिद्धांत को महत्व दिया है | POCSO अधिनियम, नियम और SOP में निर्धारित समय सीमाओं को स्वैक्षिक नहीं बल्कि आज्ञापक माना है |
इन समय सीमाओं में किसी भी हितधारक द्वारा जानबूज कर लेटलतीफी बच्चो के शीघ्र न्याय के मौलिक अधिकार का उलंघन करार दिया गया है |
नयी डिजिटल प्रणाली द्वारा यह लेटलतीफी स्वतः पकड़ ली जाएगी और आवश्यक कार्यवाही की जा सकेगी |
4. पॉक्सो पीड़ित के विश्वास की पुनर्स्थापना
POCSO Victim से सम्बंधित आपराधिक न्याय प्रणाली प्रणाली का उद्देश्य सिर्फ अपराधी की दोषसिद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार POCSO Victim की सुरक्षा, गरिमा और उनमे आत्मविश्वास की पुनर्बहाली की भावना पैदा करने तक है |
इसलिए POCSO Victim से संस्थागत बात-चीत इस प्रकार की जानी चाहिए कि उन्हें अपनी सुरक्षा, गरिमा और आत्मविश्वास की पुनर्बहाली का आभास हो सके |
5. डिजाइन द्वारा निजता और गोपनीयता की सुरक्षा
POCSO अपराधों में POCSO Victim बच्चों की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण पहलू है | इसे सिर्फ प्रक्रियात्मक नियम द्वारा सुरक्षित नहीं किया जा सकता है |
अदालत ने POCSO Victim की सुरक्षा के लिए डिजिटल तकनीकी के उपयोग पर जोर दिया है | यह तकनीकी बच्चों की अनधिकृत पहचान को असंभव बनाती है |
पॉक्सो डिजिटल मानव अधिकार मॉडल के क्रियान्वयन सम्बन्धी चुनौतियाँ
1. डिजिटल ढांचे की कमी :
ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल तथा नेट कनेक्टिविटी तथा कुशल स्टाफ की कमी SOP के मार्ग में बाधा खड़ी कर सकते हैं |
2. साइबर सुरक्षा का ख़तरा :
POCSO Victim का डिजिटल डाटा अत्यंत संवेदनशील है साइबर सुरक्षा खतरों से वह भी अछूता नहीं हो सकता है |
3. संस्थागत विरोध की संभावना :
ग्रामीण क्षेत्रों में उचित डिजिटल नेटवर्क के अभाव तथा समय से कार्य न होने पर उनके विरुद्ध कार्यवाहियों के विरोध में पुलिस, अस्पताल, बाल कल्याण समिति के लोग इस कार्य प्रणाली का विरोध कर सकते हैं |
4. कुशल मानव संसाधन की कमी :
POCSO मुकदद्मे के दौरान POCSO Victim को सलाह देने तथा सूचना देते समय आघात से बचाव और बाल मनोविज्ञान, फॉरेंसिक विज्ञान विशेषज्ञों और प्रशिक्षित कर्मियों की कमी SOP के सुचारू संचालन में बाधा खड़ी कर सकते हैं |
न्यायिक सक्रियता का परिणाम पॉक्सो डिजिटल मानव अधिकार मॉडल क्या?
यह कहने में कोई अतिश्योक्ति न होगी कि POCSO Victim की सुरक्षा और पुनर्वास के लिए POCSO अधिनियम की सैद्धांतिक सीमाओं से बाहर जाकर कर्नाटका हाई कोर्ट ने आधुनिक डिजिटल तकनीकी से लैस एक व्यवहारिक नवोन्वेषण आधुनिक डिजिटल प्रणाली को उपलब्ध कराया है |
जो भविष्य में POCSO Victim को त्वरित न्याय दिलाने के अलावा उनके मानव अधिकारों की रक्षा करने में सक्षम होगा |
कर्नाटका हाई कोर्ट के निर्णय ने स्पष्ट कर दिया है कि POCSO अधिनियम पोक्सो अपराधियों के लिए न सिर्फ सैद्धांतिक रूप से कठोर था लेकिन अब वह व्यवहारिक और तकनीकी रूप में भी कठोर हो गया है |
यद्धपि POCSO Victim के लिए POCSO डिजिटल मानवाधिकार मॉडल अभी विधिक, मानव अधिकार और नीति विशेषज्ञों द्वारा मान्यता प्राप्त शब्दावली नहीं है | यह पहली बार लेखक द्वारा विचारित शब्दावली है, लेकिन उम्मीद है इस शब्दावली पर विधिक, मानव अधिकार और नीतिगत क्षेत्र के विशेषज्ञ मंथन करेंगे |
POCSO के लागू होने के बाद शायद ही किसी माननीय न्यायधीश ने POCSO Victim के मानव अधिकारों की रक्षा और न्याय हेतु इतनी न्यायिक सक्रियता ( Judicial Activism) दिखाई हो जितनी कर्नाटका हाई कोर्ट के माननीय न्यायाधीश सूरज गोविंदाराज ने दिखाई है |
शायद लेखक को उनकी न्यायिक सक्रियता ने ही यह लेख लिखने को विवश किया है | शायद जीवन में लेखक को उनसे मिलने का मौक़ा मिला तो वह उनका अभिवादन जरूर करना चाहेगा |
POCSO Victim नाबालिग बच्चों को सिर्फ यौन अपराधों से बचाने का क़ानून नहीं है, बल्कि POCSO Victim बच्चो के साथ हुए अपराध के बाद भी उनकी सुरक्षा और पुनर्वास का एक सशक्त माध्यम है | यह बच्चो के मानव अधिकार की रक्षा का अंतिम लक्ष्य है |
डिजिटल मानव अधिकार मॉडल POCSO Victim सुरक्षा, गोपनीयता और POCSO Victim के पारदर्शी पुनर्वास को सरकार की तरफ से सुनिश्चित करने का एक अचूक औजार है |
यह मॉडल POCSO Victim की न्याय प्रक्रिया पर 24 X 7 निगरानी रखने में सक्षम होगा | इसके कारण POCSO Victim के केस पर गहन निगरानी रखी जा सकेगी, जिससे बच्चों की सुरक्षा, गोपनीयता और पुनर्वास में कोई चूक न हो |
आधुनिक डिजिटल तकनीकी से लैस यह मॉडल POCSO Victim को न्याय दिलाने और उनके मानव अधिकारों को सुरक्षित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा |
उत्तर : यह POCSO Victim के हित में एक एकीकृत डिजिटल प्रणाली है जिसमें FIR, जांच, मेडिकल केयर, मनोवैज्ञानिक सहायता, कोर्ट की सुनवाई, और पुनर्वास सम्बन्धी सभी प्रक्रियाएं एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सुरक्षित, गोपनीय, पारदर्शी और बाल केंद्रित तरीके से संचालित होती हैं।
प्रश्न 2. यह मॉडल POCSO Victim के लिए क्यों जरूरी है ?
उत्तर : क्योकि यह मॉडल POCSO Victim बच्चो को बार बार कोर्ट में आने से बचाता है ,जांच में अनावश्यक देरी से बचाना है और POCSO Victim की पहचान उजागर होने से रोकता है तथा POCSO Victim की सुरक्षा और पुनर्वास की पुख्ता व्यवस्था की गारंटी देता है |
प्रश्न 3 : PID-based anonymity क्या है?
उत्तर : यह एक अनूठी प्रणाली है जिसमें हर बच्चे को एक Personal Identification Digit (PID) दिया जाता है। सभी हितधारक इसी PID के माध्यम से पॉक्सो केस को ट्रैक करते हैं जिसके कारण POCSO Victim के नाम, पता या फोटो कुछ भी सार्वजनिक नहीं होता है |
प्रश्न 4 : Digital POCSO Portal (DPP) क्या है?
उत्तर : यह एक सिंगल विंडो प्लेटफॉर्म है जहाँ—FIR दर्ज होती है, मेडिकल रिपोर्ट और साक्ष्य अपलोड होते हैं; जाँच की प्रगति दिखती है; कोर्ट की सुनवाई की तारीखें ऑटो-अपडेट होती हैं; POCSO Victim को रियल-टाइम सपोर्ट और पुनर्वास की व्यवस्था मिलती है|
प्रश्न 5 : इस मॉडल से समयबद्ध जांच और ट्रायल कैसे सुनिश्चित किया जाता है?
उत्तर : यह डिजिटल पोर्टल स्वचालित रूप से रिमाइंडर्स प्रेषित करता है | प्रक्रिया के किसी भी स्तर पर देरी होने पर डैशबोर्ड पर रेड कलर का सिग्नल भेजता है | जिससे जांच और ट्रायल को समयबद्ध रूप से सुनिश्चित किया जा सकता है |
प्रश्न 6 : इस मॉडल के मानवाधिकार आयाम क्या हैं?
उत्तर : इस मॉडल के मानव अधिकार आयामों में गोपनीयता का अधिकार, गरिमा का अधिकार, मुआवजे का अधिकार, त्वरित और सुरक्षित न्याय का अधिकार, पुनर्वास और मानसिक स्वास्थ्य का अधिकार, बच्चों के सर्वोत्तम हित का अधिकार, अनावश्यक मानसिक आघात से सुरक्षा का अधिकार आदि शामिल हैं |
यह लेख केवल शैक्षणिक और विधिक जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |
Femicide से सुरक्षा और महिलाओं के जीवन, गरिमा तथा समान अधिकारों की रक्षा के लिए कठोर कानून और सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता
भूमिका
विश्वभर में ही नहीं बल्कि भारत में भी महिला होना मृत्यु का कारण बन रहा है। दुनिया के कई हिस्सों में पितृसत्तात्मक समाज आज भी मौजूद हैं।
पितृसत्तात्मक समाज में लैंगिक बराबरी को कोई महत्व नहीं दिया जाता।
संयुक्त राष्ट्र महिला द्वारा 25 नवंबर 2024 को जारी एक रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा का सबसे चरम रूप Femicide है, जिसका वैश्विक स्तर पर व्यापक विस्तार है।
UNO की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, विश्वभर में हर दिन 140 महिलाएँ और लड़कियाँ अपने साथी या किसी करीबी रिश्तेदार के हाथों मरती हैं।
महिलाओं के प्रति यह घृणा, जिसे Femicide कहा जाता है, कई रूपों में दिखाई देती है। भारत में यह दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, सम्मान हत्या, यौन हिंसक हत्या और महिला भ्रूण हत्या के रूप में प्रकट होती है।
यद्धपि कानून में इन्हें अलग -अलग शब्दों के साथ आवश्यकता के अनुसार परिभाषित किया गया है |
Femicide का समाजशास्त्रीय दृस्टि से तात्पर्य है कि किसी महिला या लड़की की ह्त्या सिर्फ और सिर्फ इसी कारण से कर देना कि वह महिला है | यह अपराध लैंगिक घृणा का भीभत्स स्वरूप है |
विश्वभर में तमाम वैज्ञानिक और सामाजिक तरक्की के बाबजूद आज भी महिलाओं के विरुद्ध लैंगिक आधार पर किया जाने वाला यह अपराध समाज में अस्तित्व में बना हुया है |
यद्धपि भारत में महिलाओं के विरुद्ध लैंगिक आधार पर होने वाले अपराधों को Femicide शब्द के दायरे में नहीं रखा गया है | भारत में Femicide के अपराध को अलग -अलग शब्दों से सम्बोधित किया जाता है तथा अलग -अलग श्रेणियों में बाँटा गया है |
क्या भारतीय कानूनों में Femicide नाम से कोई अपराध जाना जाता है ?
भारतीर आपराधिक कानूनों में Femicide नाम से कोई अपराध दर्ज नहीं है | हां, Femicide के रूप लैंगिक आधार पर महिलाओं की हत्यायों को अलग -अलग कानूनों के मुताबिक़ मर्डर, दहेज मृत्यु, कन्या भ्रूण ह्त्या, रेप हत्या आदि में बाँट दिया गया है |
भारत में हत्यायों का यह विभाजन Femicide की गंभीरता को छुपा देता है | यदि महिलाओं की विभिन्न कानूनों के मुताबिक़ हत्याओं को जोड़ दिया जाए तो, जो आँकड़ा तैयार होगा वह Femicide की श्रेणी में गिना जाएगा |
यदि महिला ह्त्या के सभी आकड़ो को समग्र रूप में देखा जाएगा तो आँकड़े में स्वाभाविक रूप से बृद्धि दर्ज की जाएगी | ऐसी स्थति में महिलाओं के विरुद्ध लैंगिक आधार पर अपराधों के आकड़ो के अनुसार नीति निर्माण में सही तथ्य और पारदर्शिता आएगी |
महिलाओं के विरुद्ध Femicide की रूप में आँकड़े उपलब्ध होने से सही नीतिनिर्माण में योगदान मिलेगा | जिससे भारत में Femicide से लड़ने के लिए सही रणनीतिक पहल संभव हो सकेगी |
भारत में महिलाओं के विरुद्ध ह्त्या जैसे जघन्य अपराधों के Femicide शब्द का उपयोग नहीं होता है | यद्धपि इसमें कोई शंका नहीं है कि इसके कई रूपों में भारत में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा होती है | भारत में Femicide के सबसे आम रूप है :
1. दहेज हत्या (Dowry Femicide)
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की नवीनतम रिपोर्ट ‘भारत में अपराध 2023″ के अनुसार, देश भर में दहेज प्रतिषेद अधिनियम के तहत दहेज से संबंधित 15,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए और वर्ष भर में 6,100 से अधिक दहेज मौतें हुईं।
इस प्रकार दहेज़ हत्याएं भी भारत में Femicide का ही एक रूप है |
अभी हाल ही में महाराष्ट्रा के नादेड में युवती के दोस्त को युवती के घर वालों ने मार डाला | वे आपस में विवाह का प्लान बना रहे थे |
प्रेमी के दलित होने के कारण प्रेमिका के घर वालों ने प्रेमी की ऑनर किलिंग को अंजाम दिया | इस मामले में प्रेमी की ह्त्या के बाद प्रेमिका ने उसके शव के साथ विवाह की रश्में पूरी की |
पुलिस ने ऑनर किलिंग के बाद लड़की के परिवार के 6 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है | भारत में इस प्रकार की ऑनर किलिंग Femicideका एक रूप है |
इन रूपों के अतिरिक्त भी भारत में Femicide के कई अन्य रूप उपलब्ध हैं जैसे कि बलात्कार के बाद ह्त्या ,बालिका भ्रूण ह्त्या, गुमसुदगी और तस्करी के बाद हत्याएं आदि |
अधिकाँश Femicide के अपराध जघन्य अपराधों की श्रेणी में आते है | इन अपराधों के कारण महिला मानव अधिकारों का गंभीर उल्लंघन होता है |
महिलाओं के विरुद्ध हिंसा उन्मूलन पर घोषणा 1993 के अनुछेद -3 में स्पष्ट किया गया है कि महिलाओं को बिना किसी लैंगिक भेदभाव के सभी मानव अधिकार प्राप्त हैं |
इन मानवाधिकारों में राजनीतिक,आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, नागरिक मानव अधिकारों के अलावा भी अन्य क्षेत्र में उपलब्ध मानव अधिकार आते है |
महिलायों को इन मानव अधिकारों और स्वतंत्रताओं का बिना किसी भेदभाव के सामान रूप से आनंद और संरक्षण का अधिकार प्राप्त है। इन अधिकारों में अन्य अधिकारों के अलावा निम्नांकित शामिल हैं:
👉1. जीवन का अधिकार; फेमिसाइड से मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा ,1948 के अनुछेद -3 का उलंघन होता है | घोषणा का अनुछेद -3 कहता है कि “प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत सुरक्षा का अधिकार है।”
👉2. समानता का अधिकार; मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में भी कहा गया है कि लैंगिक भेदभाव के रूप में किसी के साथ असमानता का व्यवहार नहीं किया जाएगा | किसी महिला के साथ लैंगिक आधार पर असमानता का व्यवहार भी उसके विरुद्ध हिंसा की श्रेणी में आता है |
👉3. व्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा का अधिकार; मानव अधिकार घोषणाओं और प्रसंविदा में भी हर व्यक्ति को अपनी स्वंत्रता और सुरक्षा का मानव अधिकार प्राप्त है |
👉4 . कानून के तहत समान संरक्षण का अधिकार;
👉5. सभी प्रकार के भेदभाव से मुक्त होने का अधिकार;
👉6. शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के उच्चतम मानक प्राप्त करने का अधिकार;
👉7. काम की न्यायसंगत और अनुकूल परिस्थितियों का अधिकार;
👉8. यातना, या अन्य क्रूर, अमानवीय या अपमान जनक व्यवहार या दंड के अधीन न किए जाने का अधिकार।
Femicideआज के विकसित और सभ्य समाज में भी चरम पर है | पुरुषों द्वारा सिर्फ अपने दम्भ को शांत करने के लिए लेंगिक आधार पर महिलाओं या लड़कियों की इस तरह की हत्याएं आज भी सयुक्त राष्ट्र महिला जैसे वैश्विक संगठन के लिए चिंता का विषय बना हुया है |
यह सिर्फ महिलाओं की ह्त्या का मामला नहीं है ,बल्कि महिला मानवाधिकारों का मामला है | यह हमारे सभ्य समाज के माथे पर कलंक के अलावा न्याय व्यवस्था और मानव अधिकारों पर सीधा हमला है |
जबतक महिलाओं के लिए उनके घर से लेकर सड़क और उनके कार्य स्थल तक मानव अधिकार संरक्षित नहीं हो जाते हैं, तब तक महिला मानव अधिकारों का उनके लिए कोई अस्तित्व नहीं है |
Femicide सिर्फ़ किसी एक महिला की मौत नहीं—यह हमारे समाज, न्याय व्यवस्था और मानवाधिकार मूल्यों पर सीधा हमला है। जब तक महिलाएँ अपने ही घर, सड़क, कार्यस्थल और संबंधों में सुरक्षित नहीं होंगी, तब तक मानवाधिकारों की कोई भी परिभाषा अधूरी है।
महिलाओं के विरुद्ध हर प्रकार की हिंसा रोकने की लिए भारत में क़ानून बने हुए है | बस अब जरूरत मात्र उनके गंभीरता से लागू करने और सामाजिक सोच बदलने के लिए हर प्रयास करने की आवश्यकता है |
जब तक महिला स्वयंम को घर से लेकर कार्य स्थल तक सुरक्षित न समझे, तब तक सरकार और समाज द्वारा सच्ची और ईमानदार पहल की आवश्यकता बनी रहेगी |
उत्तर : Femicide वह अपराध है जिसमें किसी महिला या लड़की की हत्या उसके महिला होने के कारण की जाती है | यह जेंडर आधारित ह्त्या का भीभत्स रूप है |
प्रश्न 2: Femicideऔर सामान्य हत्या में क्या अंतर है?
उत्तर : सामान्य हत्या किसी भी कारण से हो सकती है, सिवाए लैंगिक आधार को छोड़ कर | जबकि Femicide का उद्देश्य महिला होने के आधार पर मृत्यु कारित करना होता है |
प्रश्न 3: भारत में Femicide के मुख्य प्रकार कौन-से हैं?
उत्तर : भारत में Femicide के मुख्य प्रकार दहेज हत्या, ऑनर किलिंग, पार्टनर-हिंसा आधारित हत्या, यौन हिंसा के बाद ह्त्या तथा गर्भ में कन्या भ्रूण ह्त्या आदि हैं |
प्रश्न 4: Femicide के बारे में सयुंक्त राष्ट्र संघ (UNO) की ताज़ा रिपोर्ट क्या कहती है?
उत्तर : UN Women की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में हर 11 मिनट में एक महिला की हत्या उसके परिवारीजन या पार्टनर द्वारा होती है।
प्रश्न 5: भारत में Femicide किन कारणों से बढ़ रहा है?
उत्तर : भारत में Femicide बढ़ने के कई कारण मौजूद हैं | इन कारणों में पितृसत्तातमक व्यवस्था के साथ -साथ लैंगिक भेदभाव की व्यवस्था का होना, दहेज प्रथा, ऑनर-किलिंग, अंतरंग दोस्ती के दौरान हिंसा, लचीला क़ानून और सजा की दर का कम होना, महिलाओं के प्रति समाज में असमानता की मानसिकता आदि कारण शामिल हैं |
प्रश्न 6: क्या भारत में Femicide के लिए अलग कानून है?
उत्तर : नहीं।भारत में Femicide नाम से किसी अपराध को परिभाषित नहीं किया गया है |
यह Blog केवल शैक्षणिक और विधिक जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |
भविष्य के चुनावों को मद्देनजर रखते हुए भारत में चुनाव आयोग द्वारा देशभर में SIR (Special Intensive Revision) कार्यक्रम का अभियान तेजी से चलाया जा रहा है |
इस अभियान का उद्देश्य पुरानी मतदाता सूचियों को अद्यतन, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना है | इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए BLOs की ड्यूटी लगाईं गई है |
SIR के दौरान इन BLOs को मतदाता सूची अद्यतन के लिए लोगों के घर -घर जाकर मतदाताओं से सम्बंधित सूचनाएं का सत्यापन, उनके फॉर्म भरना, मृतकों के नामो को मतदाता सूची से हटाना, नामो को जोड़ना, डिजिटल मोड में एंट्री आदि के लिए लगाया गया है |
लेकिन इस 2025 के SIR अभियान के दौरान कई भारतीय राज्यों से लगातार BLOs की मौत या आत्महत्यायों की ख़बरों ने राजनैतिक गलियारों तथा समाज में गंभीर चिंता की लहार पैदा कर दी है |
इन घटनाओं ने चुनावी सुधार पर एक प्रश्न खड़ा कर दिया है | क्या वास्तव में यह अभियान लोकतंत्र को मजबूत कर रहा है या इसमें लगे BLOs के मानव अधिकारों पर ही कुठाराघात कर रहा है ?
आकस्मिक रूप से सामने आई यह समस्या एक गंभीर रूप धारण करती जा रही है, क्यों कि देश के विभिन्न भागों से इस तरह की घटनाओं की लगातार ख़बरें आ रही हैं |
इस समस्या की तहतक जाकर इसे समझना और उसका तत्काल निराकरण करना राज्य और चुनाव आयोग के दायित्वाधीन है |
मीडिया के हवाले से कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं
पश्चिम बंगाल के नादिया ज़िले के एक 51 वर्षीय व्यक्ति बूथ-स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) ने आत्महत्या कर ली। उसने एक सुसाइट नोट लिखा जिसमे अपनी आत्महत्या के लिए चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया गया |
उसने कहा कि मैं इस काम के दबाव को बर्दाश्त नहीं कर सकती हूँ।मुझे ऑनलाइन काम के बारे में कुछ नहीं पता।उसने स्वयं को डिजिटल तकनीकी से अनभिज्ञ बताया | जिसके कारण वह उस काम को करने से पहले ही घबरा गई और उसने यह हैरान करने वाला फैसला लिया |
बीएलओ की मृत्यु के बाद यूपी प्राथमिक शिक्षा मित्र संघ का आरोप है कि SIR के कार्य को पूरा करने के लिए निर्धारित समय सीमा 4 दिसम्बर के कारण अत्यधिक तनाव के चलते उनका स्वास्थ्य खराब हुया और मृत्यु हो गई |
हालांकि, इस सम्बन्ध में लखनऊ जिला प्रशासन ने बीएलओ पर किसी भी अनुचित दबाव का खंडन किया है | लेकिन खबरों के अनुसार ब्रेनहेमरेज से उसकी मृत्यु की पुष्टि की है |
वधेर ने अपनी पत्नी के लिए लिखे गए एक सुसाइड नोट में लिखा कि वह भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) द्वारा शुरू किए गए SIR के लिए BLO की ड्यूटी के कारण तनाव में था।
गुजरात के बड़ोदरा में 22 नवंबर,2025 को, एक सहायक बीएलओ, उषाबेन, की भी ड्यूटी के दौरान मृत्यु हो गई।
द वायर हिंदी के हवाले से न्यूज़ क्लिक ने छापा कि, उनके परिवार ने उनके बिगड़ते स्वास्थ्य के बारे में “अधिकारियों को पहले ही आगाह” कर दिया था और उन्हें छूट देने की गुहार लगाई थी।
बाबजूद इसके उन्हें बिना किसी परवाह के SIR ड्यूटी पर तैनात किया गया और आखिरकार उनकी मृत्यु हो गई |
मध्य प्रदेश राज्य के शहडोल में 54 वर्षीय बीएलओ मनीराम नापित एक गांव में एसआईआर फॉर्म एकत्र कर रहे थे |
NDTV की एक खबर के अनुसार मध्य प्रदेश में 10 दिनों में CIR अभियान के दौरान 6 BLOs /चुनाव अधिकारियों की मौत हो गई है | यह स्थति निश्चित रूप से चिंता का विषय है |
यह समस्या मानव अधिकार का मुद्दा क्यों ?
भारत में विगत कुछ दिनों में BLO की लगातार हो रही मौतें तथा आत्महत्याएं सिर्फ संख्या का मामला नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय चिंता और मानव अधिकार का विषय है |
यदि समय से इस समस्या की पहचान और उसके उचित उपचार के प्रयास नहीं किये जाते हैं तो यह मानव अधिकार उलंघन का मामला भी बन सकता है |
यद्धपि अभी यह समस्या शुरुआती दौर में है | भारत ऐसे कई अंतराष्ट्रीय मानव अधिकार घोषणाओं, सन्धियों और प्रसंविदायों का हस्ताक्षरकर्ता है, जिसके अनुसार सरकार दायित्वाधीन है कि वह बिना किसी भेदभाव के हर कर्मचारी को सुरक्षित, सम्मानजनक और कार्य की मानवीय परिस्थितियां मुहैया कराए |
लेकिन SIR के दौरान देश भर से मीडिया के माध्यम से सामने आ रही घटनाओं से यह समस्या मानव अधिकारों के सुसंगत प्रतीत होती है | इसी लिए इस समस्या को मानव अधिकार का मुद्दा माना जा सकता है |
समस्या के सुसंगत मानव अधिकार प्रावधान
समस्या से सुसंगत मानव अधिकार प्रावधानों की एक लम्बी श्रंखला है, लेकिन इस लेख को सीमित रखने के उद्देश्य से यहाँ कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों का विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है |
मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा,1948
मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुछेद 3 तथा अनुछेद 23 BLO के अधिकारों से सुसंगतता रखते है |
अनुछेद -3
घोषणा के अनुछेद -3 के अनुसार हर व्यक्ति को जीवन, सुरक्षा और व्यक्तिगत सुरक्षा का अधिकार है | मीडिया में प्रकाशित खबरों से यह पता चल रहा है कि SIR ड्यूटी के दौरान BLO द्वारा झेले जा रहे तनाव से उनकी मृत्यु या आत्महत्याएं हो रही हैं |
जिसका अर्थ है कि सरकार अपने कर्मचारियों को कार्य के दौरान बचाने में असमर्थ है तथा BLO कार्य की जोखिम भरी परिस्थतियों में कार्य करने को विवश हैं |
इस समस्या के निराकरण की तत्काल आवश्यकता है | यद्धपि अभी तक सरकार की तरफ से इस प्रकार की कोई पुष्टि नहीं हुई है कि BLOs की मौतें या आत्महत्याएं SIR ड्यूटी के दौरान जोखिम भरी कार्य की परिस्थितिओं का परिणाम है |
अनुछेद -23 : सुरक्षित और मानवीय कार्य परिस्थितियां
घोषणा का अनुछेद 23 कहता है कि हर श्रमिक को सुरक्षित और मानवीय कार्य की परिस्थितिओं का अधिकार प्राप्त है |
BLO का तनाव भरी खतरनाक परिस्थितियों में कार्य करना घोषणा में दिए गए अनुछेद 23 के विरुद्ध है | राज्य को अपने BLO के लिए अनुछेद -3 और 23 के अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध करानी चाहिए | जिससे उनके किसी भी मानव अधिकार का उल्लंघन होने से रोका जा सके |
नागरिक और राजनैतिक अधिकारों की अंतराष्ट्रीय प्रसंविदा, 1966
भारत इस प्रसंविदा का हताक्षरकर्ता देश है, इस कारण इस प्रसंविदा के प्रावधानों का अनुपालन करने के लिए विधिक रूप से प्रतिबद्ध है |
प्रसंविदा का अनुछेद -6 : जीवन का अधिकार
उक्त प्रसंविदा के अनुछेद -6 के अनुसार राज्य का दायित्व होता है कि वह अपने नागरिकों की हर प्रकार के जोखिम से रक्षा करे |
भारत में BLO की मौतों और आत्महत्यायों को रोकने के लिए समुचित उपायों की कमी राज्य के नागरिकों को बचाने के सकारात्मक दायित्व के उलंघन की श्रेणी में आएगा |
सयुंक्त राष्ट्र मानवाधिकार कमेटी द्वारा जारी जनरल कमेंट संख्या -36
इस दस्तावेज में कहा गया है कि राज्य का यह दायित्व है कि वह अपने कर्मचारियों को उन सभी कार्य सम्बन्धी जोखिमों से बचाये, जो उनकी मृत्यु का कारण बन सकते हैं |
इस प्रकार BLO की ड्यूटी पर मौतें नागरिक और राजनैतिक अधिकारों की अंतराष्ट्रीय प्रसंविदायों की श्रेणी में समझी जाएगी, यदि राज्य द्वारा कार्य के दौरान हो रही मौतों और आत्महत्यायों को रोकने के लिए कोई उचित कदम नहीं उठाये जाते हैं |
तो क्या हैं मानव अधिकार केंद्रित सुझाव ?
विगत कुछ समय में हुई BLO मौतों को दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार द्वारा जल्द से जल्द BLO सुरक्षा और कल्याण नीतियों का निर्माण किये जाने की आवश्यकता है | ये नीतियां निम्नवत हो सकती हैं :-
1. SIR ड्यूटी के लिए आज्ञापक स्वास्थ्य प्रोटोकॉल | इसके तहत किसी भी संवेदन और गंभीर बीमारी ग्रस्त व्यक्ति को ड्यूटी से मुक्त रखा जाना चाहिए |
2. ड्यूटी के दौरान मृत्यु पर बीमा तथा मुआवजा नीति | BLO की मृत्यु पर बिना किसी अनावश्य्क फोर्मलिटी के आर्थिक सहायता का प्रावधान किया जाना चाहिए |
3. आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था का प्रावधान किया जाना चाहिए |
4. कार्य दबाब प्रबंधन की समुचित व्यवस्था का प्रावधान किया जाना चाहिए|
5 . हर BLO को डिजिटल कार्य की ट्रेनिंग की व्यवस्था का प्रावधान किया जाना चाहिए |
6 . डिजिटल वेरीफिकेशन पर अधिक बल दिया जाना चाहिए |
निष्कर्ष
वर्ष 2025 चुनाव आयोग द्वारा कराये जा रहे SIR के दौरान BLO की मौतों ,उनके स्वास्थ्य खराब होने की घटनाओं और उनकी आत्महत्यायों के अनेक मामले मीडिया द्वारा रिपोर्ट करने पर उजागर हुए हैं |
ये सभी घटनाएं चुनावी सुधार प्रक्रिया के दौरान घटी हैं | ये घटनाएं सिर्फ कुछ आँकड़ा भर नहीं हैं, बल्कि अत्यधिक गंभीर चेतावनी की ओर संकेत करती हैं |
यह स्वास्थ्य के अधिकार और जीवन के अधिकार का महत्वपूर्ण मामला है न कि सिर्फ कुछ लोगों की संख्या का | राज्य अपने नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार के प्रति सदैव सचेत और प्रतिबद्ध रहता है |
राज्य की SIR हेतु की जा रही पहल विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को मजबूत करने की पहल है तथा इसके लिए कार्य कर रहे BLOs ही इसे धरातल पर पहुंचा सकते हैं |
वे इस SIR की रीढ़ की हड्डी हैं | यदि रीढ़ की हड्डी ही संकट में हो तो कितना भी मजबूत व्यक्ति सही ढंग से जीवन नहीं जी सकता है |
इसलिए BLOs पर आये अभिकथित मानव अधिकार संकट को तत्काल पहचानने और समझने की आवश्यकता है, जिससे इस गंभीर समस्या का सही समय से इलाज किया जा सके |
यदि हम सचमुच लोकतंत्र को मजबूती देना चाहते है तो इसको मजबूत करने के कार्य में लगे लोगों की समस्या को समझना और उन्हें संरक्षण देना राज्य के दायित्वाधीन है |
भारत का चुनाव आयोग भी राज्य के अधीन है तथा निष्पक्ष चुनाव कराना उसकी जिम्मेदारी है, लेकिन लोकतंत्र को मजबूत बनाये रखने के लिए उसके मातहत कार्य करने वाले लोगों के मानव अधिकारों को समझने और उनके संरक्षण की जिम्मेदारी से वह भाग नहीं सकता है |
उम्मीद की जानी चाहिए कि चुनाव आयोग मीडिया के हवाले से आ रही BLOs की मौतों और आत्महत्याओं की खबरों पर तत्काल संज्ञान लेगा और कोई न कोई मानव अधिकार केंद्रित समाधान अवश्य निकालेगा |
NGT ने पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को मजबूत करते हुए भारत में पर्यावरण न्याय को नई दिशा दी।
परिचय
नए भारत में पर्यावरण प्रदूषण सिर्फ पारिस्थितिकी का विषय नहीं रहा है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य, स्वच्छ जीवन और जीवन के अधिकार से जुड़ा मानव अधिकार का मूल प्रश्न बन चुका है |
भारत में पर्यावरण संरक्षण और उससे जुड़े मानव अधिकारों के संरक्षण के संवैधानिक दायित्व को पूरा करने के किये वर्ष 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT)की स्थापना की गई थी |
यह एक ऐसा विशेष न्यायाधिकरण है जिसने लगभग पिछले 15 वर्षों में पर्यावरण न्याय की दिशा में बहुत तेजी और प्रभावी तरीके से काम किया है |
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) न सिर्फ पर्यावर्णीय हानि को रोकता है, बल्कि उससे जुड़े मानव अधिकारों के उलंघन से भी बचाता है |
राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने भारत में न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण में, बल्कि मानव अधिकार संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | जिसे हम कई उदाहरणों के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे |
भारत का माननीय सुप्रीम कोर्ट पर्यावरण न्याय के प्रति अत्यधिक सचेत और संवेदनशील है | सुप्रीम कोर्ट ने विधि व्यवस्था M K Ranjitsinh & Ors Versus Union of India & Ors, 2024 INSC 280 में कई कई विधि व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए कहा है कि पर्यावरण सम्बंधित अंतराष्ट्रीय मानव अधिकार कानूनों को न्यायालय तथा वकीलों को न्याय के दौरान भूलना नहीं चाहिए |
विधि व्यवस्था परिधान निर्यात संवर्धन परिषद बनाम ए.के. चोपड़ा, AIR 1999 SC 625 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे मामलों का हवाला दिया जो इस प्रस्ताव के लिए मिसाल कायम करते हैं कि इस न्यायालय को उन अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेजों को लागू करना चाहिए जिनमें भारत पक्षकार है:
“ सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में इस बात पर ज़ोर दिया है कि संवैधानिक आवश्यकताओं पर चर्चा करते समय, न्यायालय और वकील को अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और दस्तावेजों में निहित मूल सिद्धांत को कभी नहीं भूलना चाहिए और जहाँ तक संभव हो, उन अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेजों में निहित सिद्धांतों को लागू करना चाहिए।
न्यायालयों का दायित्व है कि वे घरेलू कानूनों की व्याख्या के लिए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और मानदंडों को उचित ध्यान दें, खासकर तब जब उनके बीच कोई असंगतता न हो और घरेलू कानून में कोई शून्यता हो।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 253 में स्पष्ट कहा गया है कि भारतीय संसद को किसी अन्तराष्ट्र्रीय मानव अधिकार संधि, समझौते या अभिसमय को क्रियान्वित करने के लिए भारत के सम्पूर्ण क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति है।
इन्ही सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए भारतीय संसद ने विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों को नियंत्रित करने के लिए कई क़ानून बनाये हैं |
सुप्रीम कोर्ट का फैसला M.C. Mehta v. Union of India, (2000) 2 SCC 679 प्रदूषण के ताजमहल पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर था | यह मामला ताज महल के आस पास चलने वाले ईंट भट्टे और कोयले से प्रदुषण फैलाने वाली फैक्ट्रीयों से जुड़ा था | सुप्रीम कोर्ट ने माना कि रासायनिक प्रदूषण ताजमहल को नुकसान पहुंचा रहा हैं।
ताजमहल के आसपास के इलाके को ताज ट्रेपेजियम जोन घोषित करते हुए इस जोन में कोयले से संचालित सभी उधोगो को कोयले के स्थान पर प्रोपेन जैसे स्वच्छ ईंधन का उपयोग करने या फिर स्थानांतरित होने का निर्देश दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट की विधि व्यवस्था में स्थापित किया कि स्वच्छ पर्यावरण संविधान के अनुछेद 21 के तहत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है |
इसमें यह भी स्थापित किया गया कि प्रदुषण फैलाने वाले उधोगों पर Polluters Pays Principles के सिद्धांत के अनुरूप जुर्माना लगाया जाना चाहिए |
इस निर्णय के बाद के बाद दुनिया को पता लगा कि यह सिर्फ प्रदुषण का मामला नहीं है बल्कि स्वास्थ्य के अधिकार और जीवन के अधिकार का महत्वपूर्ण मुद्दा है |
Almitra H. Patel v. Union of India(NGT OA No. 199 /2014) का केस पहले माननीय सुप्रीम कोर्ट में बतौर जनहित याचिका के रूप में दाखिल हुया था |
बाद में यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में स्थानांतरित कर दिया गया | यह मामला शुष्क अपशिष्ट (ठोस कचरा) प्रबंधन से जुड़ा था | इस मुकदद्मे के दौरान शुष्क अपशिष्ट के अपर्याप्त प्रबंधन से होने वाली जन स्वास्थ्य की हानी के बारे में जानकारी हुई |
इस केस में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने शुष्क अपशिष्ट प्रबंधन के आदेश किये साथ में यह भी निर्देशित किया कि ठोस कूड़ा प्रबंधन नियम, 2016 को सम्पूर्ण देश में लागू किया जाए |
इस प्रकार NGT ने इस मुद्दे को एक सफाई की समस्या नहीं रहने दिया, बल्कि इसे मानवीय जीवन और स्वास्थ्य के लिए संकट बताकर मानव अधिकार का गंभीर मुद्दा बना दया | आज यह मुद्दा मानव अधिकार का महत्वपूर्ण घटक के रूप में देखा जाता है |
विधि व्यवस्था Arjun Gopal v. Union of India, (2017) 1 SCC 412 में अर्जुन गोपाल और अन्य ने रिट याचिका (सिविल) संख्या 728/2015 दायर की थी |
इस याचिका में याचिकाकर्ताओं ने अदालत से आतिशबाजी (पटाखों सहित) के इस्तेमाल पर रोक लगाने, हानिकारक फसलों को जलाने से रोकने तथा मलबा फेंकने और पर्यावरण शुद्धता की दिशा में अन्य कदम उठाने की मांग की गई थी ।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि पिछले वर्ष दिवाली के दौरान पटाखों के व्यापक उपयोग से दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में वायु गुणवत्ता मानक बिगड़ गए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि सर्दियों की शुरुआत से ही इस क्षेत्र में वायु गुणवत्ता बिगड़ जाती है |
यह दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बन गया है तथा यहाँ वायु प्रदूषण विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों से 29 गुना अधिक हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में कहा कि वायु प्रदूषण के प्रतिकूल प्रभावों को ध्यान में रखते हुए तथा स्वच्छ हवा में सांस लेने के मानव अधिकार और स्वास्थ्य के मानव अधिकार को भी ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार और अन्य प्राधिकारियों को यह विचार करना चाहिए कि लोगों को व्यक्तिगत रूप से आतिशबाजी चलाने के लिए हतोत्साहित किया जाए तथा उसके बजाय सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से आतिशबाजी के प्रदर्शन को प्रोत्साहित किये जाने पर चिंतन किया जाना चाहिए |
विधि व्यवस्था एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ एवं अन्य, (1988) 2 SCR 530 में कानपुर, उत्तर प्रदेश में गंगा जल के प्रदूषण के नियंत्रण, रोकथाम और उसकी समाप्ति के संबंध में नगर निकाय की जिम्मेदारी के मुद्दे को उठाया गया था।
जिसके निर्णय में जल और वायु प्रदूषण के गंभीर परिणामों और प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण और सुधार की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, जिसे संविधान के तहत मौलिक कर्तव्यों में से एक माना जाता है |
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 51ए के खंड (छ) के अनुसार केंद्र सरकार का यह कर्तव्य है कि वह पूरे भारत के सभी शैक्षणिक संस्थानों को निर्देश दे कि वे पहली दस कक्षाओं में सप्ताह में कम से कम एक घंटा वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण और सुधार से संबंधित पाठ पढ़ाएँ।
इस निर्णय से नदी में शवों और अधजले शवों को गंगा नदी में फेंकने की प्रथा पर भी प्रतिबन्ध लगाया गया है |
इस प्रकार आप देखेंगे कि NGT की स्थापना के बाद पर्यावरण प्रदुषण से सम्बंधित अनेक मामलों की सुनवाई की गई है | जिनमे प्रदुषण को रोकने के लिए विभिन राज्य सरकारों तथा संस्थाओं को अनेक दिशा निर्देश आवश्यकता अनुसार जारी किये गए |
अनेक मामलों में NGT द्वारा दिए गए निर्णय के बेहतरीन परिणाम देखने को मिले हैं | इनमे आगरा का ताज ट्रेपेजियम जोन का मामला अत्यधिक महत्वपूर्ण है |
आगरा के आसपास सभी प्रदूषणकारी खतरनाक उधोग बंद हो गए या स्थानांतरित हो गए | इसके अतिरिक्त ताज ट्रेपेजियम जोन में चलने वाले सभी ईंट के भट्टे, जो कोयले पर आधारित थे, बंद करा दिए गए |
निसंदेह अनेक मामलों में NGT के फैसलों का प्रभाव प्रदुषण नियंत्रण के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है | प्रदुषण नियंत्रण सतत विकास के लिए एक आवश्यक शर्त है |
पर्यावरण संरक्षण और मानव अधिकार एक दूसरे के पूरक हैं | पर्यावरण संरक्षण से अनेक मानव अधिकारों का स्वतः ही संरक्षण हो जाता है क्यों कि कई मानव अधिकार एक दूसरे पर अंतर्निर्भर होते हैं |
इसे देखते हुए स्पष्ट है कि NGT न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है, बल्कि आम और खास जन सभी के मानव अधिकारों का भी बिना किसी भेदभाव के संरक्षण कर रहा है |
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) भारत में प्रदुषण नियंत्रण के लिए विशेष न्यायिक ट्रिब्यूनल है | नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भारत को प्रदूषण की गिरफ्त से बाहर निकालने में बहुत योगदान दिया है |
यही नहीं ट्रिब्यूनल ने प्रदुषण की दिशा को पर्यावरण संरक्षण की ओर ले जाने का काम किया है | ट्रिब्यूनल की यात्रा प्रदुषण को प्रदुषण मुक्त वातावरण में बदलने और उनसे जुड़े मानव अधिकारों की रक्षा की रही है |
NGT की मानव अधिकारों की यात्रा सिर्फ कागजों पर मानव अधिकारों से संबधित नहीं रही है, बल्कि यह यात्रा मानव अधिकारों को धरातल पर आभास कराने की रही है | जिसमे शामिल है सवास्थ्य, सुरक्षा और मानव अधिकार केंद्रित एक नए भारत की मजबूत और सुरक्षित बुनियाद |
उत्तर : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक्ट के अनुसार, 2010 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की स्थापना हुई थी | यह एक विशिष्ट न्यायिक निकाय है |यह देश में पर्यावरण प्रदुषण और संरक्षण के मामलो में निर्णय के लिए विशेषज्ञता विशेषज्ञता रखता है।अधिकाँश पर्यावरण से जुड़े मामले बहुविषयक होते हैं | जिनका एक ही मंच से निराकरण किया जाता है | भारत के अंतराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों के अनुसरण में राष्ट्रीय पर्यावरण क़ानून के विकास और उनका प्रभावी अनुपालन के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट और विधि आयोग की सिफारिशों से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की स्थापना की गई थी |
👉प्रश्न 2 :नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का कार्य क्या है ?
उत्तर : ट्रिब्यूनल का कार्य पर्यावरण प्रदुषण और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विषयों ,जिसमे वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण भी शामिल हैं, से जुड़े मुकदद्मों को देखना और उनमे निर्णय देना है |
👉प्रश्न 3 :नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में किस प्रकार के मुकदद्मों की सुनवाई की जाती है |
उत्तर : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक्ट,2010 की अनुसूची 1 में दिए गए विषयों के सम्बन्ध में पर्यावरण हानि के लिए राहत तथा मुआवजे की मांग करने वाला कोई भी व्यक्ति नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में अपनी शिकायत /याचिका को प्रस्तुत कर सकता है | अनुसूची 1 में दिए गए विषय निम्नवत हैं :
(1).जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974;
(2).जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977;
(3).वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980;
(4).वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981;
(5).पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986;
(6).सार्वजनिक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991;
(7).जैविक विविधता अधिनियम, 2002.
👉प्रश्न 4 : क्या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश बाध्यकारी हैं ?
उत्तर : हाँ , नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के द्वारा दिए गए आदेश बाध्यकारी होते हैं |
👉प्रश्न 5 : क्या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को पर्यावरण प्रदुषण से प्रभावित व्यक्तियों को मुआवजा और छतिपूर्ति के रूप में राहत प्रदान करने काअधिकार है |
उत्तर : हाँ , इसे प्रभावित व्यक्तियों को मुआवज़ा और क्षतिपूर्ति के रूप में राहत प्रदान करने का अधिकार प्राप्त है।
👉प्रश्न 6 : क्या मुझे न्यायाधिकरण तक पहुंचने के लिए किसी वकील की मदद लेनी होगी?
उत्तर : नहीं, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के समक्ष किसी मामले को ले जाने के लिए किसी वकील की नियुक्ति आवश्यक नहीं है। पीड़ित पक्ष अपनी शिकायत निश्चित प्रारूप पर ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है |
👉प्रश्न 7 : क्या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्णय बाध्यकारी हैं?
उत्तर: हाँ, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्णय बाध्यकारी प्रभाव रखते हैं, क्योंकि इसमें निहित शक्तियाँ सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन दीवानी प्रकृति की हैं |
👉प्रश्न 8 : क्या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्णय अंतिम होते हैं?
उत्तर : नहीं, ट्रिब्यूनल को अपने निर्णयों की समीक्षा करने का अधिकार है। ट्रिब्यूनल के निर्णय के विरुद्ध विपक्षी पक्ष नब्बे दिनों के भीतर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती पेश कर सकता है।
👉प्रश्न 9 : क्या भारत में पराली जलाना कानूनी है?
उत्तर : नहीं, भारत में पराली जलाना कानूनी नहीं है | पराली जलाने पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद जुर्माना दो गुना कर दिया गया है |
अस्वीकरण :
यह लेख केवल शैक्षणिक और विधिक जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |
Note: Image credit: AI-generated illustration (created with ChatGPT)