बाल सुरक्षा पर बड़ा प्रश्न : POCSO के बाद भी लगभग 70% मामलों में आरोपी बरी क्यों हो रहे हैं?

POCSO के बाद भी 70% मामलों में आरोपी बरी होने को दर्शाती बाल सुरक्षा पर प्रतीकात्मक छवि।
Source:Canvaa

प्रस्तावना 

भारत में यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा के लिए POCSO जैसा कठोर कानून मौजूद है, बाबजूद इसके NCRB के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 70% मामलों में आरोपी बरी हो जाते हैं। यह केवल कानूनी और नीतिगत विफलता नहीं है, बल्कि बाल मानव अधिकार का गंभीर संकट है |   

विगत वर्षों के आकड़ों पर निगाह डालने से पता लग रहा है कि बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों की संख्या लगातार बढ़ रही है |  

सरकार के गृहमंत्रालय द्वारा पॉक्सो अपराधियों की दोषसिद्धि के सम्बन्ध में जारी किये गए आँकड़े पॉक्सो पीड़ितों को न्याय के हिसाब से निराशा पैदा करने वाले हैं | प्रश्न यह भी उठता है कि क्या POCSO पीड़ितों के लिए सिर्फ कानून काफी है ? 

इस क़ानून के लागू होने के 12 साल बाद भी बालकों की सुरक्षा के प्रति चिंता करनी पड़ रही है | यह चिंता अनायास नहीं है, बल्कि पॉक्सो के मामलों में अभियुक्तों की दोष सिद्धि की दर का कम होना है | अब यह सवाल सिर्फ कानूनी नहीं है, बल्कि यह सवाल बाल मानव अधिकार संकट का  बन गया है |  

POCSO Act  क्या है ?

POCSO Act का विस्तृत रूप में Protection of Children from Sexual Offences Act,2012  नाम है | यह नाबालिग बच्चों अर्थात 18 वर्ष से कम आयु के बच्चो को यौन शोषण, यौन उत्पीड़न तथा अश्लील सामग्री में उपयोग जैसे अपराधों से बचाने तथा अपराध घटित होने के बाद उन्हें  संरक्षण, पुनर्वास और न्याय दिलाने के लिए बनाया गया है | इसमें सजा के कठोर प्रावधानों की वजह से इसे एक कठोर क़ानून के रूप में भी जाना जाता है | 

POCSO एक्ट के अधीन अपराधों के प्रकार 

POCSO एक्ट के अंतर्गत मुख्य रूप से निम्नलिखित अपराधों को समाहित किया गया है :

1. प्रवेशन लैंगिक हमला (Penitrative Sexual Assult)

2. गुरुत्तर प्रवेशन लैंगिक हमला (Aggravatated Sexual Assult) 

इस प्रकार का गुरुत्तर प्रवेशन लैंगिक हमला तब कहा जाता है जब निम्नांकित में से एक या अधिक परिस्थिति अस्तित्व में हों :

(a) जब पुलिस अधिकारी होते हुए, सशस्त्र बल या सुरक्षा बल का सदस्य होते हुए या कोई लोकसेवक होते हुए या किसी जेल, प्रतिप्रेषण-गृह या संरक्षण गृह या सम्प्रेषण गृह या तत्समय प्रवृत किसी विधि द्वारा या उसके अधीन स्थापित अभिरक्षा या देखभाल और संरक्षण के किसी अन्य स्थान का प्रबंध या कर्मचारी होते हुए लैंगिक हमला करता है तो वह इस श्रेणी के अपराध में आएगा | 

(b ) जो कोई किसी अस्पताल सरकारी या प्राइवेट का प्रबंधक या कर्मचारी होते हुए हमला करता है | 

(c )  जो कोई किसी शैक्षणिक संस्था या धार्मिक संस्था का प्रबंधक या कर्मचारी होते हुए लैंगिक हमला करता है | 

(d ) बालक पर सामूहिक लैंगिक हमला होता है | 

(e ) जो कोई घातक आयुध, अग्नायुध, गर्म पदार्थ या संक्षारक पर्दाथ का उपयोग करते हुए हमला करता है | 

(f ) जो कोई बालक को गंभीर चोट पहुंचाते हुए या उसकी जननेद्रियों को छति करते हुए लैंगिक हमला करता है| 

(g )  लैंगिक हमले के कारण कोई बच्चा शारीरिक रूप से अशक्त हो जाता है या घातक रोग से ग्रस्त हो जाता है | 

(h ) जो बालक की शारीरिक या मानसिक दिव्यांगता का लाभ उठाकर लैंगिक हमला करता है | 

(i ) जो कोई बालक पर बार -बार लैंगिक हमला करता है | 

(j ) जो कोई 12 वर्ष से कम आयु के बालक पर लैंगिक हमला करता है | 

(k )जो कोई, बालक का रक्त  या दत्तक या विवाह या संरक्षता द्वारा या पोषण देख्भाल करने वाला रिस्तेदार या माता पिता के साथ घरेलू सम्बन्ध में रहते हुए या जो बालक के साथ साझा गृहस्थी में रहता है, लैंगिक हमला करता है | 

(l ) बालक की गर्भावस्था की जानकारी के बाद भी लैंगिक हमला करता है | 

(m) बालक पर लैंगिक हमले के साथ उसकी हत्या का प्रयास करता है | 

(n )जो कोई प्राकृतिक आपदा की स्तिथि के दौरान लैंगिक हमला करता है, आदि |

3. लैंगिक उत्पीड़न (Sexual Harassment )

4. अश्लील प्रयोजन के लिए किसी बालक का उपयोग 

इस अपराध के प्रयोजन के लिए “किसी बालक का उपयोग ” पद में अश्लील सामिग्री को तैयार, उत्पादन, प्रस्थापन, पारेषण, प्रकाशन और वितरण करने के लिए मुद्रण, इलेक्ट्रॉनिक, कंप्यूटर या किसी अन्य तकनीकी के किसी माध्यम से किसी बालक को अंतर्वलित करना शामिल है | 

5.बालक को अंतर्ग्रस्त करने वाले अश्लील साहित्य के भंडारण 

6. पॉक्सो में दिए गए किसी अपराध का दुष्प्रेरण 

7. पॉक्सो में दिए गए किसी अपराध का प्रयास भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है |  

पॉक्सो अभियुक्त सम्बंधित दोषमुक्ति आँकड़ा  (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो  आधारित )

भारत के गृह मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो हर वर्ष भारत में होने वाले अपराधों के सम्बन्ध में एक रिपोर्ट जारी करता है | 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों के अनुसार भारत में पॉक्सो के दर्ज होने वाले मामलो में लगातार बृद्धि हो रही है | 

वर्ष 2023 की NCRB की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 की तुलना में एक वर्ष में पॉक्सो अपराध के मामलों में 9.2 % की बृद्धि दर्ज की गई है | जिससे स्पष्ट है कि पॉक्सो जैसे कठोर क़ानून के बाबजूद पोक्सो अपराधों में निरंतर बृद्धि दर्ज की गई है | 

यह रिपोर्ट पोक्सो अपराधों  में होने वाली दोषसिद्धि की दर का भी खुलासा करती है | जिसके अनुसार 2021 में दोषसिद्धि की दर मात्र 32 प्रतिशत के आसपास रही है | जिसका अर्थ है कि करीब  65 से 70 प्रतिशत अपराधी दोषमुक्त हो रहे हैं | जिसमे अलग- अलग कई कारण हो सकते हैं | 

इसका सीधा अर्थ है कि अपराधी कठोर क़ानून के बाबजूद आपराधिक न्याय व्यवस्था की खामियों का फायदा उठाने में कामयाब हो रहे हैं | 

यह स्थति निश्चित रूप से न सिर्फ आम आदमी के लिए चुनौती और चिंता का विषय है, बल्कि सम्पूर्ण आपराधिक न्याय व्यवस्था और सरकार के लिए भी एक गंभीर चुनौती और चिंतन का विषय है | 

POCSO अपराधियों के बच निकलने सम्बंधित चुनौतियाँ 

इसमें कोई दो राय नहीं कि पॉक्सो एक कठोर समझे जाने वाला कानून है, लेकिन पुलिस की कमजोर तथा अवैज्ञानिक जांच भी अधिकाँश मामलो में अभियुक्तों को दोषमुक्त कराने में सहायक बन जाती है|

पुलिस की पोक्सो पीड़ितों के साथ असंवेदनशीलता भी उन्हें पोक्सो  के मामले में पीछे हटने के लिए विवश कर देती है | गवाह संरक्षण का व्यवहारिक अभाव भी दोषसिद्धि की कम दर के लिए जिम्मेदार कारकों में से एक महत्वपूर्ण कारक है | 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आकड़ो से स्पष्ट है कि अधिकाँश पोक्सो के मामलों में नजदीकी या परिवारीजन ही अपराधी पाए गए हैं | यह भी एक महत्वपूर्ण कारण है जिसके चलते अक्सर सामाजिक दबाब में पीड़ित तथा उसके परिवारीजन घटना से ही मुकरने को विवश हो जाते हैं |

कुछ अर्थपूर्ण सुझाव 

POCSO के तहत पॉक्सो अपराधियों की दोषसिद्धि की दर को बढ़ाये जाने के लिए हर जिले में बाल पुलिस इकाई को पॉक्सो सम्बन्धी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए | 

पुलिस को साक्ष्य संकलन का भी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए | पॉक्सो पीड़ितों का चिकित्सकीय परीक्षण और फोरेंसिक जांच सही समय पर होनी चाहिए | यही नहीं फोरेंसिक जांच समय से न्यायालय में पहुचनी चाहिए | 

पॉक्सो के गवाहों के संरक्षण की व्यवस्था के साथ साथ उनकी भी गोपनीयता के प्रावधान के बारे में चिंतन की आवश्यकता है | 

पॉक्सो पीड़ित बच्चो के लिए मनोवैज्ञानिक सहायता को आज्ञापक बनाया जाना चाहिए | पॉक्सो मामलों की सुनवाई के लिए जजों और प्रॉसिक्यूटर्स का प्रशिक्षण भी आज्ञापक किया जाना चाहिए | 

बिना प्रशिक्षण पाए जजों को पॉक्सो मामलो की सुनवाई से दूर रखा जाना चाहिए | पोक्सो मामलो में न्यायिक प्रक्रिया के सुचारू और बिना देरी के संचालित करने के लिए पॉक्सो मानव अधिकार डिजिटल मॉडल का उपयोग किया जाना चाहिए |

देश भर में स्कूलों के सहयोग से विधिक सेवा प्राधिकार द्वारा बच्चों में कम उम्र से ही यौन शोषण और यौन उत्पीड़न के बारे में जागरूकता बढ़ाने का कार्य  किया जाए |

पॉक्सो मानव अधिकार डिजिटल मॉडल कुछ और नहीं, बल्कि पॉक्सो केस की प्रथम सूचना से लेकर निर्णय होने तक की प्रक्रिया में आधुनिक डिजिटल तकनीकी का उपयोग करते हुए पीड़िता के मानव अधिकार और न्याय सुनिश्चित करना है |     

निष्कर्ष 

POCSO जैसे कठोर कानून की उपलब्ध्ता के बाबजूद भी अगर पॉक्सो अपराधी बच रहे हैं, तो यह सिर्फ कानून की विफलता नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण समाज और व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है |जिस पर तत्काल गंभीर चिंतन किये जाने की आवश्यकता है | 

बाल सुरक्षा का तात्पर्य सिर्फ कठोर क़ानून का निर्माण करना ही नहीं है, बल्कि न्याय तक अंतराष्ट्रीय मानव अधिकार लिखितों के अनुसरण में बालकों की आसान और गरिमामई पहुंच सुनिश्चित करना है |

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1. POCSO कानून होने के बावजूद इतने अधिक आरोपी बरी क्यों हो जाते हैं?

उत्तर : POCSO के कठोर क़ानून होने के बाबजूद उसका उचित क्रियान्वयन आवश्यक होता है | पोक्सो मामलो में जांच में देरी, पुलिस द्वारा सही सबूतों के संकलन का अभाव, पीड़ित के बयानों में विरोधाभाष तथा अभियोजन की लापरवाही के कारण बड़ी संख्या में आरोपी बरी हो जाते हैं | 

 प्रश्न  2. NCRB के अनुसार पॉक्सो अभियुक्तों की दोषसिद्धि की दर कितनी है?

उत्तर: NCRB के ताजा आकड़ो के अनुसार,पॉक्सो मामलों में दोषसिद्धि की दर करीं 32 प्रतिशत तक है | यह बाल सुरक्षा व्यवस्था पर एक प्रश्न चिन्ह है | 

प्रश्न 3. क्या POCSO मामलों में पुलिस जांच कमजोर रहती है?

उत्तर : हां, कुछ मामलों में पुलिस जांच कमजोर रहती है | कई मामलो में पुलिस पीड़िता की उम्र के सही साक्ष्य संकलित नहीं करती है | 

चिकित्सा प्रमाण पत्र के आधार पर ही पीड़िता की आयु को मान लिया जाता है | जिसके कारण पीड़िता की सही उम्र का निर्धारण न्यायालय में नहीं हो पाता है | जिसका लाभ अभियुक्त को पहुँचता है | 

इसके पीछे प्रशिक्षित अधिकारियों की कमी के साथ साथ फोरेंसिक रिपोर्ट का समय से न जुटाना शामिल है  | पुलिस द्वारा पीड़िता की चिकित्सा में देरी तथा चार्जशीट में कमिया छोड़ देना भी पुलिस जांच कमजोरी में समाहित हैं |   

प्रश्न 4. क्या सामाजिक दबाब या समझौते भी पोक्सो अपराधियों के बरी होनी के कारण हैं | 

उत्तर : हाँ , आज भी परिवार और ग्रामीण क्षेत्रों में समझौता, सामाजिक दबाब के चलते  तथा पीड़ित की अपराधी पर आर्थिक निर्भरता ऐसे कारण हैं जो पीड़ित या उसके परिवार को मुकदद्मे से अपने पैर वापस लेने के लिए विवश कर देते हैं | 

प्रश्न  5 . क्या पोक्सो  के झूठे मामले भी पोक्सो अपराधों की  बरी होने की दर बढ़ाता है ?

उत्तर : हाँ, निश्चित रूप से कुछ प्रतिशत झूठे मामले भी अभियुक्तों के बरी होने की दर बढ़ाता है | 

प्रश्न  6 . क्या POCSO कानून में सुधार की आवश्यकता है?

उत्तर : कानून में कठोर सजा के प्रावधान से कानून का उचित क्रियान्वयन नहीं होता है,  इस लिए जांच प्रक्रिया में सुधार, पीड़ित की सुरक्षा, पुनर्वास और मुआवजा के प्रावधानों को और अधिक सुधारात्मक और डिजिटल तकनीकी युक्त सुधार किया जा सकता है |  

लेखक- Human Rights Guru ब्लॉग के सँस्थापक हैं | उनसे rkjassa1109@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है।

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धन्यवाद |

   

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