लेखक: Dr Raj Kumar

  • SIR ड्यूटी में BLO मौतें: क्या चुनावी सुधार बन रहा है मानव अधिकार संकट?

    SIR ड्यूटी में BLO मौतें: क्या चुनावी सुधार बन रहा है मानव अधिकार संकट?

    चुनावी कार्य में BLO की मौतें – मानव अधिकार मुद्दा
    Source:Google Gemini

    प्रस्तावना

    भविष्य के चुनावों को मद्देनजर रखते हुए भारत में चुनाव आयोग द्वारा देशभर में SIR (Special Intensive Revision) कार्यक्रम का अभियान तेजी से चलाया जा रहा है | 

    इस अभियान का उद्देश्य पुरानी मतदाता सूचियों को अद्यतन, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना है | इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए BLOs की ड्यूटी लगाईं गई है | 

    SIR के दौरान इन BLOs को मतदाता सूची अद्यतन के लिए लोगों के घर -घर जाकर मतदाताओं से सम्बंधित सूचनाएं का सत्यापन, उनके फॉर्म भरना, मृतकों के नामो को मतदाता सूची से हटाना, नामो को जोड़ना, डिजिटल मोड में एंट्री आदि के लिए लगाया गया है | 

    लेकिन इस 2025 के SIR अभियान के दौरान कई भारतीय राज्यों से लगातार BLOs की मौत या आत्महत्यायों की ख़बरों ने राजनैतिक गलियारों तथा समाज में गंभीर चिंता की लहार पैदा कर दी है | 

    इन घटनाओं ने चुनावी सुधार पर एक प्रश्न खड़ा कर दिया है | क्या वास्तव में यह अभियान लोकतंत्र को मजबूत कर रहा है या इसमें लगे BLOs के मानव अधिकारों पर ही कुठाराघात कर रहा है ?

    आकस्मिक रूप से सामने आई यह समस्या एक गंभीर रूप धारण करती जा रही है, क्यों कि देश के विभिन्न भागों से इस तरह की घटनाओं की लगातार ख़बरें आ रही हैं | 

    इस समस्या की तहतक जाकर इसे समझना और उसका तत्काल निराकरण करना राज्य और चुनाव आयोग के दायित्वाधीन है |  

     मीडिया के हवाले से कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं 

    पश्चिम बंगाल के नादिया ज़िले के एक 51 वर्षीय व्यक्ति बूथ-स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) ने आत्महत्या कर ली। उसने एक सुसाइट नोट लिखा जिसमे अपनी आत्महत्या के लिए चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया गया | 

    उसने कहा कि मैं इस काम के दबाव को बर्दाश्त नहीं कर सकती हूँ।मुझे ऑनलाइन काम के बारे में कुछ नहीं पता। उसने स्वयं को डिजिटल तकनीकी से अनभिज्ञ बताया | जिसके कारण वह उस काम को करने से पहले ही घबरा गई और उसने यह हैरान करने वाला फैसला लिया | 

    उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अभी इसी महीने में बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) के पद पर तैनात 50 वर्षीय शिक्षा मित्र विजय कुमार वर्मा को ब्रेनहेमरेज हो गया जिनकी एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। 

    बीएलओ की मृत्यु के बाद यूपी प्राथमिक शिक्षा मित्र संघ का आरोप है कि SIR के कार्य को पूरा करने के लिए निर्धारित समय सीमा 4 दिसम्बर के कारण अत्यधिक तनाव के चलते उनका स्वास्थ्य खराब हुया और मृत्यु हो गई |

    हालांकि, इस सम्बन्ध में लखनऊ जिला प्रशासन ने बीएलओ पर किसी भी अनुचित दबाव का खंडन किया है | लेकिन खबरों के अनुसार ब्रेनहेमरेज से उसकी मृत्यु की पुष्टि की है | 

    गुजरात राज्य के गिर सोमनाथ जिले में अभी हाल ही में 40 वर्षीय सरकारी स्कूल शिक्षक अरविंद वढेर ने अपने घर के अंदर फांसी  लगा ली

    वधेर ने अपनी पत्नी के लिए लिखे गए एक सुसाइड नोट में लिखा कि वह भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) द्वारा शुरू किए गए SIR के लिए BLO की ड्यूटी के कारण तनाव में था। 

    गुजरात के बड़ोदरा में 22 नवंबर,2025 को, एक सहायक बीएलओ, उषाबेन, की  भी ड्यूटी के दौरान मृत्यु हो गई। 

    द वायर हिंदी के हवाले से न्यूज़ क्लिक ने छापा कि, उनके परिवार ने उनके बिगड़ते स्वास्थ्य के बारे में “अधिकारियों को पहले ही आगाह” कर दिया था और उन्हें छूट देने की गुहार लगाई थी। 

    बाबजूद इसके उन्हें बिना किसी परवाह के SIR ड्यूटी पर तैनात किया गया और आखिरकार उनकी मृत्यु हो गई | 

    मध्य प्रदेश राज्य के शहडोल में 54 वर्षीय बीएलओ मनीराम नापित एक गांव में एसआईआर फॉर्म एकत्र कर रहे थे | 

    इसी दौरान लंबित लक्ष्यों के बारे में पूछताछ ले लिए एक अधिकारी से फोन पर बातचीत हुई और कुछ ही मिनटों बाद बेहोश हो गए और उनकी मृत्यु हो गई  

    NDTV की एक खबर के अनुसार मध्य प्रदेश में 10 दिनों में CIR अभियान के दौरान 6 BLOs /चुनाव अधिकारियों की मौत हो गई है | यह स्थति निश्चित रूप से चिंता का विषय है | 

    यह समस्या मानव अधिकार का मुद्दा क्यों ?

    भारत में विगत कुछ दिनों में BLO की लगातार हो रही मौतें तथा आत्महत्याएं सिर्फ संख्या का मामला नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय चिंता और मानव अधिकार का विषय है | 

    यदि समय से इस समस्या की पहचान और उसके उचित उपचार के प्रयास नहीं किये जाते हैं तो यह मानव अधिकार उलंघन का मामला भी बन सकता है | 

    यद्धपि अभी यह समस्या शुरुआती दौर में है | भारत ऐसे कई अंतराष्ट्रीय मानव अधिकार घोषणाओं, सन्धियों और प्रसंविदायों का हस्ताक्षरकर्ता है, जिसके अनुसार सरकार दायित्वाधीन है कि वह बिना किसी भेदभाव के हर कर्मचारी को सुरक्षित, सम्मानजनक और कार्य की मानवीय परिस्थितियां मुहैया कराए |   

    लेकिन SIR के दौरान देश भर से मीडिया के माध्यम से सामने आ रही घटनाओं से यह समस्या मानव अधिकारों के सुसंगत प्रतीत होती है | इसी लिए इस समस्या को मानव अधिकार का मुद्दा माना जा सकता है | 

    समस्या के सुसंगत मानव अधिकार प्रावधान 

    समस्या से सुसंगत मानव अधिकार प्रावधानों की एक लम्बी श्रंखला है, लेकिन इस लेख को सीमित रखने के उद्देश्य से यहाँ कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों का विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है | 

    मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा,1948 

    मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुछेद 3 तथा अनुछेद 23 BLO के अधिकारों से सुसंगतता रखते है | 

    अनुछेद -3 

    घोषणा के अनुछेद -3 के अनुसार हर व्यक्ति को जीवन, सुरक्षा और व्यक्तिगत सुरक्षा का अधिकार है | मीडिया में प्रकाशित खबरों से यह पता चल रहा है कि SIR ड्यूटी के दौरान BLO द्वारा झेले जा रहे तनाव से उनकी मृत्यु या आत्महत्याएं हो रही हैं |

    जिसका अर्थ है कि सरकार अपने कर्मचारियों को कार्य के दौरान बचाने में असमर्थ है तथा BLO कार्य की जोखिम भरी परिस्थतियों में कार्य करने को विवश हैं | 

    इस समस्या के निराकरण की तत्काल आवश्यकता है | यद्धपि अभी तक सरकार की तरफ से इस प्रकार की कोई पुष्टि नहीं हुई है कि BLOs की मौतें या आत्महत्याएं SIR ड्यूटी के दौरान जोखिम भरी कार्य की परिस्थितिओं का परिणाम है |  

    अनुछेद -23 : सुरक्षित और मानवीय कार्य परिस्थितियां 

    घोषणा का अनुछेद 23 कहता है कि हर श्रमिक को सुरक्षित और मानवीय कार्य की परिस्थितिओं का अधिकार प्राप्त है | 

    BLO का तनाव भरी खतरनाक परिस्थितियों में कार्य करना घोषणा में दिए गए अनुछेद 23 के विरुद्ध है | राज्य को अपने BLO के लिए अनुछेद -3  और 23 के अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध करानी चाहिए | जिससे उनके किसी भी मानव अधिकार का उल्लंघन होने से रोका जा सके | 

    नागरिक और राजनैतिक अधिकारों की अंतराष्ट्रीय प्रसंविदा, 1966 

    भारत इस प्रसंविदा का हताक्षरकर्ता देश है, इस कारण इस प्रसंविदा के प्रावधानों का अनुपालन करने के लिए विधिक रूप से प्रतिबद्ध है | 

    प्रसंविदा का अनुछेद -6 : जीवन का अधिकार 

    उक्त प्रसंविदा के अनुछेद -6 के अनुसार राज्य का दायित्व होता है कि वह अपने नागरिकों की हर प्रकार के जोखिम से रक्षा करे | 

    भारत में BLO की मौतों और आत्महत्यायों को रोकने के लिए समुचित उपायों की कमी राज्य के नागरिकों को बचाने के सकारात्मक दायित्व के उलंघन की श्रेणी में आएगा | 

    सयुंक्त राष्ट्र मानवाधिकार कमेटी द्वारा जारी जनरल कमेंट संख्या -36 

    इस दस्तावेज में कहा गया है कि राज्य का यह दायित्व है कि वह अपने कर्मचारियों को उन सभी कार्य सम्बन्धी जोखिमों से बचाये, जो उनकी मृत्यु का कारण बन सकते हैं | 

    इस प्रकार BLO की ड्यूटी पर मौतें नागरिक और राजनैतिक अधिकारों की अंतराष्ट्रीय प्रसंविदायों की श्रेणी में समझी जाएगी, यदि राज्य द्वारा कार्य के दौरान हो रही मौतों और आत्महत्यायों को रोकने के लिए कोई उचित कदम नहीं उठाये जाते हैं | 

    तो क्या हैं मानव अधिकार केंद्रित सुझाव ? 

    विगत कुछ समय में हुई BLO मौतों को दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार द्वारा जल्द से जल्द BLO सुरक्षा और कल्याण नीतियों का निर्माण किये जाने की आवश्यकता है | ये नीतियां निम्नवत हो सकती हैं :-

    1. SIR ड्यूटी के लिए आज्ञापक स्वास्थ्य प्रोटोकॉल | इसके तहत किसी भी संवेदन और गंभीर बीमारी ग्रस्त व्यक्ति को ड्यूटी से मुक्त रखा जाना चाहिए | 

    2. ड्यूटी के दौरान मृत्यु पर बीमा तथा मुआवजा नीति | BLO की मृत्यु पर बिना किसी अनावश्य्क फोर्मलिटी के आर्थिक सहायता का प्रावधान किया जाना चाहिए | 

    3. आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था का प्रावधान किया जाना चाहिए | 

    4.  कार्य दबाब प्रबंधन की समुचित व्यवस्था का प्रावधान किया जाना चाहिए| 

    5 . हर BLO को डिजिटल कार्य की ट्रेनिंग की व्यवस्था का प्रावधान किया जाना चाहिए | 

    6 . डिजिटल वेरीफिकेशन पर अधिक बल दिया जाना चाहिए | 

    निष्कर्ष 

    वर्ष 2025 चुनाव आयोग द्वारा कराये जा रहे SIR के दौरान BLO की मौतों ,उनके स्वास्थ्य खराब होने की घटनाओं और उनकी आत्महत्यायों के अनेक मामले मीडिया द्वारा रिपोर्ट करने पर उजागर हुए हैं |

    ये सभी घटनाएं चुनावी सुधार प्रक्रिया के दौरान घटी हैं | ये घटनाएं सिर्फ कुछ आँकड़ा भर नहीं हैं, बल्कि अत्यधिक गंभीर चेतावनी की ओर संकेत करती हैं | 

    यह स्वास्थ्य के अधिकार और जीवन के अधिकार का महत्वपूर्ण मामला है न कि सिर्फ कुछ लोगों की संख्या का | राज्य अपने नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार के प्रति सदैव सचेत और प्रतिबद्ध रहता है | 

    राज्य की SIR हेतु की जा रही पहल विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को मजबूत करने की पहल है तथा इसके लिए कार्य कर रहे BLOs ही इसे धरातल पर पहुंचा सकते हैं | 

    वे इस SIR की रीढ़ की हड्डी हैं | यदि रीढ़ की हड्डी ही संकट में हो तो कितना भी मजबूत व्यक्ति सही ढंग से जीवन नहीं जी सकता है | 

    इसलिए BLOs पर आये अभिकथित मानव अधिकार संकट को तत्काल पहचानने और समझने की आवश्यकता है, जिससे इस गंभीर समस्या का सही समय से इलाज किया जा सके | 

    यदि हम सचमुच लोकतंत्र को मजबूती देना चाहते है तो इसको मजबूत करने के कार्य में लगे लोगों की समस्या को समझना और उन्हें संरक्षण देना राज्य के दायित्वाधीन है | 

    भारत का चुनाव आयोग भी राज्य के अधीन है तथा निष्पक्ष चुनाव कराना उसकी जिम्मेदारी है, लेकिन लोकतंत्र को मजबूत बनाये रखने के लिए उसके मातहत कार्य करने वाले लोगों के मानव अधिकारों को समझने और उनके संरक्षण की जिम्मेदारी से वह भाग नहीं सकता है | 

    उम्मीद की जानी चाहिए कि चुनाव आयोग मीडिया के हवाले से आ रही BLOs की मौतों और आत्महत्याओं की खबरों पर  तत्काल संज्ञान लेगा और कोई न कोई मानव अधिकार केंद्रित समाधान अवश्य निकालेगा |  

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  • NGT ने कैसे बदला पर्यावरण न्याय? जानिए पूरा सच (2026)

    NGT ने भारत में पर्यावरण न्याय को कैसे बदला, दर्शाता हुआ पर्यावरण और न्याय आधारित इन्फोग्राफिक।
    NGT ने पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को मजबूत करते हुए भारत में पर्यावरण न्याय को नई दिशा दी।

    परिचय

    नए भारत में पर्यावरण प्रदूषण सिर्फ पारिस्थितिकी का विषय नहीं रहा है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य, स्वच्छ जीवन और जीवन के अधिकार से जुड़ा मानव अधिकार का मूल प्रश्न बन चुका है | 

    भारत में पर्यावरण संरक्षण और उससे जुड़े मानव अधिकारों के संरक्षण के संवैधानिक दायित्व को पूरा करने के किये वर्ष 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT)की स्थापना की गई थी | 

    यह एक ऐसा विशेष न्यायाधिकरण है जिसने लगभग पिछले 15 वर्षों में पर्यावरण न्याय की दिशा में  बहुत तेजी और प्रभावी तरीके से काम किया है | 

    राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) न सिर्फ पर्यावर्णीय हानि को रोकता है, बल्कि उससे जुड़े मानव अधिकारों के उलंघन से भी बचाता है | 

    राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने भारत में न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण में, बल्कि मानव अधिकार संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | जिसे हम कई उदाहरणों के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे |  

    यह भी पढ़ें : अब हर शिकायत पर FIR नहीं होगी? UP के नए नियम ने मचाई बहस !

    सुप्रीम कोर्ट, पर्यावरण न्याय और मानव अधिकार

    भारत का माननीय सुप्रीम कोर्ट पर्यावरण न्याय के प्रति अत्यधिक सचेत और संवेदनशील है | सुप्रीम कोर्ट ने विधि व्यवस्था M K Ranjitsinh & Ors  Versus Union of India & Ors2024 INSC 280 में कई कई विधि व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए कहा है कि पर्यावरण सम्बंधित अंतराष्ट्रीय मानव अधिकार कानूनों को न्यायालय तथा वकीलों को न्याय के दौरान भूलना नहीं चाहिए | 

    विधि व्यवस्था परिधान निर्यात संवर्धन परिषद बनाम ए.के. चोपड़ा, AIR 1999 SC 625 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे मामलों का हवाला दिया जो इस प्रस्ताव के लिए मिसाल कायम करते हैं कि इस न्यायालय को उन अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेजों को लागू करना चाहिए जिनमें भारत पक्षकार है:

    “ सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में इस बात पर ज़ोर दिया है कि संवैधानिक आवश्यकताओं पर चर्चा करते समय, न्यायालय और वकील को अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और दस्तावेजों में निहित मूल सिद्धांत को कभी नहीं भूलना चाहिए और जहाँ तक संभव हो, उन अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेजों में निहित सिद्धांतों को लागू करना चाहिए। 

    न्यायालयों का दायित्व है कि वे घरेलू कानूनों की व्याख्या के लिए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और मानदंडों को उचित ध्यान दें, खासकर तब जब उनके बीच कोई असंगतता न हो और घरेलू कानून में कोई शून्यता हो।

    भारत के संविधान के अनुच्छेद 253 में स्पष्ट कहा गया है कि भारतीय संसद को किसी अन्तराष्ट्र्रीय मानव अधिकार संधि, समझौते या अभिसमय को क्रियान्वित करने के लिए भारत के सम्पूर्ण क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति है।

    इन्ही सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए भारतीय संसद ने विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों को नियंत्रित करने के लिए कई क़ानून बनाये हैं | 

    ये क़ानून हैं :

    (1).जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974

    (2).जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977

    (3).वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980

    (4).वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981

    (5).पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986

    (6).सार्वजनिक दायित्व बीमा अधिनियम,1991;

    (7 ) राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम ,2010

    (8).जैविक विविधता अधिनियम, 2002. |

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    NGT के योगदान वाले प्रमुख क्षेत्र तथा मामले 

    1.वायु प्रदुषण 

    सुप्रीम कोर्ट का फैसला  M.C. Mehta v. Union of India, (2000) 2 SCC 679  प्रदूषण के ताजमहल पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर था | यह मामला ताज महल के आस पास चलने वाले ईंट भट्टे और  कोयले से प्रदुषण फैलाने वाली फैक्ट्रीयों से जुड़ा था | सुप्रीम कोर्ट ने माना कि रासायनिक प्रदूषण ताजमहल को नुकसान पहुंचा रहा हैं। 

    ताजमहल के आसपास के इलाके को ताज ट्रेपेजियम जोन घोषित करते हुए इस जोन में कोयले से संचालित सभी उधोगो को कोयले के स्थान पर प्रोपेन जैसे स्वच्छ ईंधन का उपयोग करने या फिर स्थानांतरित होने का निर्देश दिया गया।  

    सुप्रीम कोर्ट की विधि व्यवस्था में स्थापित किया कि स्वच्छ पर्यावरण संविधान के अनुछेद 21 के तहत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है | 

    इसमें यह भी स्थापित किया गया कि प्रदुषण फैलाने वाले उधोगों पर Polluters Pays Principles के सिद्धांत के अनुरूप जुर्माना लगाया जाना चाहिए |  

    इस निर्णय के बाद के बाद दुनिया को पता लगा कि यह सिर्फ प्रदुषण का मामला नहीं है बल्कि  स्वास्थ्य के अधिकार और जीवन के अधिकार का महत्वपूर्ण मुद्दा है | 

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    2.शुष्क अपशिष्ट प्रबंधन का मामला

    Almitra H. Patel v. Union of India(NGT OA No. 199 /2014) का केस पहले माननीय सुप्रीम कोर्ट में बतौर जनहित याचिका के रूप में दाखिल हुया था |

    बाद में यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में स्थानांतरित कर दिया गया | यह मामला शुष्क अपशिष्ट (ठोस कचरा) प्रबंधन से जुड़ा था | इस मुकदद्मे के दौरान शुष्क अपशिष्ट के अपर्याप्त प्रबंधन से होने वाली जन स्वास्थ्य की हानी के बारे में जानकारी हुई | 

    इस केस में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने शुष्क अपशिष्ट प्रबंधन के आदेश किये साथ में यह भी निर्देशित किया कि ठोस कूड़ा प्रबंधन नियम, 2016 को सम्पूर्ण देश में लागू किया जाए | 

    इस प्रकार NGT ने इस मुद्दे को एक सफाई की समस्या नहीं रहने दिया, बल्कि इसे मानवीय जीवन और स्वास्थ्य के लिए संकट बताकर मानव अधिकार का गंभीर मुद्दा बना दया | आज यह मुद्दा मानव अधिकार का महत्वपूर्ण घटक के रूप में देखा जाता है | 

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    3. दिल्ली वायु प्रदूषण और पटाखा केस

    विधि व्यवस्था Arjun Gopal v. Union of India, (2017) 1 SCC 412 में  अर्जुन गोपाल और अन्य ने रिट याचिका (सिविल) संख्या 728/2015 दायर की थी | 

    इस याचिका में याचिकाकर्ताओं ने अदालत से आतिशबाजी (पटाखों सहित) के इस्तेमाल पर रोक लगाने, हानिकारक फसलों को जलाने से रोकने तथा मलबा फेंकने और पर्यावरण शुद्धता की दिशा में अन्य कदम उठाने की मांग की गई थी । 

    याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि  पिछले वर्ष दिवाली के दौरान पटाखों के व्यापक उपयोग से दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में वायु गुणवत्ता मानक बिगड़ गए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि सर्दियों की शुरुआत से ही इस क्षेत्र में वायु गुणवत्ता बिगड़ जाती है | 

    यह दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बन गया है तथा यहाँ वायु प्रदूषण विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों से 29 गुना अधिक हो गया है।

    सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में कहा कि वायु प्रदूषण के प्रतिकूल प्रभावों को ध्यान में रखते हुए तथा स्वच्छ हवा में सांस लेने के मानव अधिकार और स्वास्थ्य के मानव अधिकार को भी ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार और अन्य प्राधिकारियों को यह विचार करना चाहिए कि लोगों को व्यक्तिगत रूप से आतिशबाजी चलाने के लिए हतोत्साहित किया जाए तथा उसके बजाय सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से आतिशबाजी के प्रदर्शन को प्रोत्साहित किये जाने पर चिंतन किया जाना चाहिए | 

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    4. नदियों में सीवेज बहाव से प्रदूषण की समस्या  

    विधि व्यवस्था एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ एवं अन्य, (1988) 2 SCR 530 में  कानपुर, उत्तर प्रदेश में गंगा जल के प्रदूषण के नियंत्रण, रोकथाम और उसकी समाप्ति के संबंध में नगर निकाय की जिम्मेदारी के मुद्दे को उठाया गया था। 

    जिसके निर्णय में जल और वायु प्रदूषण के गंभीर परिणामों और प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण और सुधार की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, जिसे संविधान के तहत मौलिक कर्तव्यों में से एक माना जाता है | 

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 51ए के खंड (छ) के अनुसार केंद्र सरकार का यह कर्तव्य है कि वह पूरे भारत के सभी शैक्षणिक संस्थानों को निर्देश दे कि वे पहली दस कक्षाओं में सप्ताह में कम से कम एक घंटा वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण और सुधार से संबंधित पाठ पढ़ाएँ। 

    इस निर्णय से नदी में शवों और अधजले शवों को गंगा नदी में फेंकने की प्रथा पर भी प्रतिबन्ध लगाया गया है |  

    इस प्रकार आप देखेंगे कि NGT की स्थापना के बाद पर्यावरण प्रदुषण से सम्बंधित अनेक मामलों की सुनवाई की गई है | जिनमे प्रदुषण को रोकने के लिए विभिन राज्य सरकारों तथा संस्थाओं को अनेक दिशा निर्देश आवश्यकता अनुसार जारी किये गए | 

    अनेक मामलों में NGT द्वारा दिए गए निर्णय के बेहतरीन परिणाम देखने को मिले हैं | इनमे आगरा का ताज ट्रेपेजियम जोन का मामला अत्यधिक महत्वपूर्ण है | 

    आगरा के आसपास सभी प्रदूषणकारी खतरनाक उधोग बंद हो गए या स्थानांतरित हो गए | इसके अतिरिक्त  ताज ट्रेपेजियम जोन में चलने वाले सभी ईंट के भट्टे, जो कोयले पर आधारित थे, बंद करा दिए गए | 

    निसंदेह अनेक मामलों में NGT के फैसलों का प्रभाव प्रदुषण नियंत्रण के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है | प्रदुषण नियंत्रण सतत विकास के लिए एक आवश्यक शर्त है | 

    पर्यावरण संरक्षण और मानव अधिकार एक दूसरे के पूरक हैं | पर्यावरण संरक्षण से अनेक मानव अधिकारों का स्वतः ही संरक्षण हो जाता है क्यों कि कई मानव अधिकार एक दूसरे पर अंतर्निर्भर होते हैं | 

    इसे देखते हुए स्पष्ट है कि NGT न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है, बल्कि आम और खास जन सभी के मानव अधिकारों का भी बिना किसी भेदभाव के संरक्षण कर रहा है | 

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    निष्कर्ष

    नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) भारत में प्रदुषण नियंत्रण के लिए विशेष न्यायिक ट्रिब्यूनल है | नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भारत को प्रदूषण की गिरफ्त से बाहर निकालने में बहुत योगदान दिया है | 

    यही नहीं ट्रिब्यूनल ने प्रदुषण की दिशा को पर्यावरण संरक्षण की ओर ले जाने का काम किया है | ट्रिब्यूनल की यात्रा प्रदुषण को प्रदुषण मुक्त वातावरण में बदलने और उनसे जुड़े मानव अधिकारों की रक्षा की रही है | 

    NGT की  मानव अधिकारों की यात्रा सिर्फ कागजों पर मानव अधिकारों से संबधित नहीं रही है, बल्कि  यह यात्रा मानव अधिकारों को धरातल पर आभास कराने की रही है | जिसमे शामिल है सवास्थ्य, सुरक्षा और मानव अधिकार केंद्रित  एक नए भारत की मजबूत और सुरक्षित बुनियाद | 

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    अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न(FAQ):

    👉प्रश्न 1 :नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) क्या है?

    उत्तर : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक्ट के अनुसार, 2010 में  नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की स्थापना हुई थी | यह एक विशिष्ट न्यायिक निकाय है |यह देश में पर्यावरण प्रदुषण और संरक्षण के मामलो में निर्णय के लिए विशेषज्ञता विशेषज्ञता रखता है।अधिकाँश पर्यावरण से जुड़े मामले बहुविषयक होते हैं | जिनका एक ही मंच से निराकरण किया जाता है | भारत के अंतराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों के अनुसरण में राष्ट्रीय पर्यावरण क़ानून के विकास और उनका प्रभावी अनुपालन के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट और विधि आयोग की सिफारिशों से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की स्थापना की गई थी |  

    👉प्रश्न 2  :नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का कार्य क्या है ?

    उत्तर : ट्रिब्यूनल का कार्य पर्यावरण प्रदुषण और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विषयों ,जिसमे वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण भी शामिल हैं, से जुड़े मुकदद्मों को देखना और उनमे निर्णय देना है | 

    👉प्रश्न 3 :नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में किस प्रकार के मुकदद्मों की सुनवाई की जाती है |

    उत्तर : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक्ट,2010 की अनुसूची 1 में दिए गए विषयों के सम्बन्ध में पर्यावरण हानि के लिए राहत तथा मुआवजे की मांग करने वाला कोई भी व्यक्ति नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में अपनी शिकायत /याचिका को प्रस्तुत कर सकता है | अनुसूची 1 में दिए गए विषय निम्नवत हैं :

            (1).जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974;

            (2).जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977;

            (3).वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980;

            (4).वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981;

            (5).पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986;

            (6).सार्वजनिक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991;

            (7).जैविक विविधता अधिनियम, 2002.

    👉प्रश्न 4  : क्या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश बाध्यकारी हैं ?

    उत्तर : हाँ , नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के द्वारा दिए गए आदेश बाध्यकारी होते हैं | 

    👉प्रश्न 5 : क्या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को पर्यावरण प्रदुषण से प्रभावित व्यक्तियों को मुआवजा और छतिपूर्ति के रूप में राहत प्रदान करने काअधिकार है |  

    उत्तर : हाँ , इसे प्रभावित व्यक्तियों को मुआवज़ा और क्षतिपूर्ति के रूप में राहत प्रदान करने का अधिकार प्राप्त है।

    👉प्रश्न 6 : क्या मुझे न्यायाधिकरण तक पहुंचने के लिए किसी वकील की मदद लेनी होगी?

    उत्तर : नहीं, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के समक्ष किसी मामले को ले जाने के लिए किसी वकील की नियुक्ति आवश्यक नहीं है। पीड़ित पक्ष अपनी शिकायत निश्चित प्रारूप पर ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है | 

    👉प्रश्न  7 : क्या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल  के निर्णय बाध्यकारी हैं?

    उत्तर: हाँ, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्णय बाध्यकारी प्रभाव रखते हैं, क्योंकि इसमें निहित शक्तियाँ सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन दीवानी  प्रकृति की हैं | 

    👉प्रश्न 8 : क्या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्णय अंतिम होते हैं?

    उत्तर : नहीं, ट्रिब्यूनल को अपने निर्णयों की समीक्षा करने का अधिकार है। ट्रिब्यूनल के निर्णय के विरुद्ध विपक्षी पक्ष नब्बे दिनों के भीतर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती  पेश कर सकता है।

    👉प्रश्न 9 : क्या भारत में पराली जलाना कानूनी है?

    उत्तर : नहीं, भारत में पराली जलाना कानूनी नहीं है | पराली जलाने पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद जुर्माना दो गुना कर दिया गया है | 

    अस्वीकरण :

    यह लेख केवल शैक्षणिक और विधिक जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |

    Note: Image credit: AI-generated illustration (created with ChatGPT)

     लेखक

    Dr Raj Kumar
    Founder- Human Rights Guru / Law Vs Reality